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28 January, 2021

लाला लाजपत राय का जीवन परिचय

 

लाला लाजपत राय का जीवन परिचय

शेर-ए-पंजाब



जन्मतिथि: 28 जनवरी 1865

जन्म स्थान: मोगा, पंजाब

पिता का नाम: राधाकृष्ण अग्रवाल

निधन: 17 नवंबर 1928

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के नायकों में से एक और लाल, बाल, पाल की तिकड़ी के मशहूर नेता लाला लाजपत राय का जीवन आज भी युवा पीढ़ी के लिए प्रेरणा का स्रोत बना हुआ है. उन्होंने न सिर्फ आजादी की लड़ाई के दौरान नेतृत्व किया बल्कि अपने जीवन उदाहरणों से उस आदर्श को स्थापित करने में सफलता पाई, जिसकी कल्पना एक आदर्श राजनेता में की जाती है.

लाला लाजपत राय का जन्म 28 जनवरी, 1865 को पंजाब के मोगा में एक साधारण परिवार में हुआ था. उनके पिता लाला राधाकृष्ण एक अध्यापक रहे. इसका प्रभाव लाजपत राय पर भी पड़ा. शुरूआती दिनों से ही वे एक मेधावी छात्र रहे और अपनी स्कूली शिक्षा पूरी करने के बाद वकालत की ओर रुख कर लिया. वे एक बेहतरीन वकील बने और कुछ समय तक वकालत भी की, लेकिन जल्दी ही उनका मन इस काम से उचट गया. अंग्रेजों की न्याय व्यवस्था के प्रति उनके मन में रोष पैदा हो गया. उन्होंने उस व्यवस्था को छोड़कर  बैंकिंग का रूख किया.

उन्होंने अपनी आजीविका चलाने के लिए बैंकिंग का नवाचार किया. उस समय तक भारत में बैंक कोई बहुत अधिक लोकप्रिय नहीं थे, लेकिन उन्होंने इसे चुनौती की तरह लिया और पंजाब नेशनल बैंक तथा लक्ष्मी बीमा कंपनी की स्थापना की. दूसरी तरफ वे लगातार कांग्रेस के माध्यम से अंग्रेजों की खिलाफत करते रहे. अपनी निर्भिकता और गरम स्वभाव के कारण इन्हें पंजाब केसरी के उपाधी से नवाजा गया. बाल गंगाधर तिलक के बाद वे उन शुरूआती नेताओं में से थे, जिन्होंने पूर्ण स्वराज की मांग की. पंजाब में वे सबसे लोकप्रिय नेता बन कर उभरे.

आजादी के प्रखर सेनानी होने के साथ ही लाला जी का झुकाव भारत में तेजी से फैल रहे आर्य समाज आंदोलन की तरफ भी था. इसका परिणाम हुआ कि उन्होंने जल्दी ही महर्षि दयानंद सरस्वती के साथ मिलकर इस आंदोलन का आगे बढ़ाने का काम ​हाथ में ले लिया. आर्य समाज भारतीय हिंदू समाज में फैली कूरीतियों और धार्मिक अंधविश्वासों पर प्रहार करता था और वेदों की ओर लौटने का आवाहन करता था. लाला जी ने उस वक्त लोकप्रिय जनमानस के विरूद्ध खड़े होने का साहस किया. ये उस दौर की बात है जब आर्य समाजियों को धर्मविरोधी समझा जाता ​था, लेकिन लाला जी ने इसकी कतई परवाह नहीं की. जल्दी ही उनके प्रयासों से आर्य समाज पंजाब में लोकप्रिय हो गया. 

उन्होंने दूसरा और ज्यादा महत्वपूर्ण कार्य भारतीय शिक्षा के क्षेत्र में कि​या. अभी तक भारत में पारम्परिक शिक्षा का ही बोलबाला था​. जिसमें शिक्षा का माध्यम संस्कृत और उर्दू ​थे. ज्यादातर लोग उस शिक्षा से वंचित थे जो यूरोपीय शैली या अंग्रेजी व्यवस्था पर आधारित थी. आर्य समाज ने इस दिशा में दयानंद एंग्लो वैदिक विद्यालयों को प्रारंभ किया, जिसके प्रसार और प्रचार के लिए लाला जी ने हरसंभव प्रयास किए. आगे चलकर पंजाब अपने बेहतरीन डीएवी स्कूल्स के लिए जाना गया. इसमें लाला लाजपत राय का योगदान अविस्मरणीय रहा.

शिक्षा के क्षेत्र में उनकी दूसरी महत्वपूर्ण उपलब्धि लाहौर का डीएवी कॉलेज रहा. उन्होंने इस कॉलेज के तब के भारत के बेहतरीन शिक्षा के केन्‍द्र में तब्दील कर दिया. यह कॉलेज उन युवाओं के लिए तो वरदान साबित हुआ, जिन्होंने असहयोग आंदोलन के दौरान अंग्रेजों द्वारा संचालित कॉलेजों को धता बता दिया था. डीएवी कॉलेज ने उनमें से अधिकांश की शिक्षा की व्यवस्था की.


भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस से जुड़ना लाला जी के जीवन की सबसे महत्वपूर्ण घटना थी. 1888 में कांग्रेस का वार्षिक अधिवेशन इलाहाबाद में हुआ और यह पहला अवसर था जब लाला लाजपत राय को इस संगठन से जुड़ने का अवसर मिला. अपने शुरूआती दिनों में ही उन्होंने एक उत्साही कार्यकर्ता के तौर पर कांग्रेस में पहचान बनानी शुरू कर दी. धीरे—धीरे वे कांग्रेस के पंजाब प्रांत के सर्वमान्य प्रतिनिधि मान लिए गए. 1906 में उनको कांग्रेस ने गोपालकृष्ण के साथ गए शिष्टमंडल का सदस्य बनाया. संगठन में उनके बढ़ते कद का यह परिचायक बनी. कांग्रेस में उनके विचारों के कारण उठापटक प्रारंभ हुई. वे बाल गंगाधर तिलक और विपिनचंद्र पाल के अलावा तीसरे नेता थे, जो कांग्रेस को अंग्रेजों की पिछलग्गू संस्था की भूमिका से ऊपर उठाना चाहते थे.

कांग्रेस में अंग्रेज सरकार की खिलाफत की वजह से वे ब्रिटिश सरकार की नजरों में अखरने लग गए. ब्रिटिशर्स चाहते थे कि उन्हें कांग्रेस से अलग कर दिया जाए, लेकिन उनका कद और लोकप्रियता देखते हुए, यह करना आसान नहीं था. 1907 में लाला लाजपत राय के नेतृत्व में किसानों ने अंग्रेज ​सरकार के खिलाफ आंदोलन शुरू कर दिया. अंग्रेज सरकार ऐसे ही मौके के तलाश में थी और उन्होंने लालाजी को न सिर्फ गिरफ्तार किया, बल्कि उन्हें देश निकाला देते हुए बर्मा के मांडले जेल में कैद कर दिया गया, लेकिन सरकार का यह दांव उल्टा पड़ गया और लोग सड़कों पर उतर आए. दबाव में अंग्रेज सरकार को फैसला वापस लेना पड़ा और लाला जी एक बार फिर अपने लोगों के बीच वापस आए.

1907 आते—आते लाला जी के विचारों से कांग्रेस का एक धड़ा पूरी तरह असहमत दिखने लगा था. लाला जी को उस गरम दल का हिस्सा माना जाने लगा था, जो अंग्रेज सरकार से लड़कर पूर्ण स्वराज लेना चाहती थी. इस पूर्ण स्वराज को अमेरिकी स्वतंत्रता संग्राम और प्रथम विश्व युद्ध से बल मिला और लाला जी भारत में एनीबेसेंट के साथ होमरूल के मुख्य वक्ता बन कर सामने आए. जलिया वाला बाग कांड ने उनमें अंग्रेज सरकार के खिलाफ और ज्यादा असंतोष भर दिया. इसी बीच कांग्रेस में महात्मा गांधी का प्रादुर्भाव हो चुका था और अंतरराष्ट्रीय पटल पर गांधी स्थापित हो चुके थे. 1920 में गांधी द्वारा चलाए गए असहयोग आंदोलन में उन्होंने बढ़—चढ़ कर हिस्सा लिया. उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया, लेकिन तबियत बिगड़ जाने पर उन्हें रिहा कर दिया गया. इसी बीच उनके संबंध लगातार कांग्रेस से बिगड़ते रहे और 1924 में उन्होंने कांग्रेस छोड़कर स्वराज पार्टी में शामिल हुए और केन्द्रिय असेम्बली के सदस्य चुने गये. यहां भी जल्दी ही उनका मन उचट गया और उन्होंने नेशलिस्ट पार्टी का गठन किया और एक बार फिर असेम्बली का हिस्सा बने.

भारत की आजादी की लड़ाई एक बड़ा वाकया उस वक्त घटित हुआ, जब भारतीयों से बात करने आए साइमन कमीशन का विरोध का फैसला गांधी द्वारा लिया गया. साइमन कमीशन जहां भी गया, वहां साइमन गो बैक के नारे बुलंद हुए. 30 अक्टूबर 1928 को जब कमीशन लाहौर पहुंचा, तो लाला लाजपत राय के नेतृत्व में एक दल शांतिपूर्वक साइमन गो बैक के नारे लगाता हुआ अपना विरोध दर्ज करवा रहा था. तभी अंग्रेज पुलिस ने उन पर लाठीचार्ज कर दिया और एक युवा अंग्रेज अफसर ने लालाजी के सर पर जोरदार प्रहार किया. लाला जी का कथन था— मेरे शरीर पर पड़ी एक—एक लाठी ब्रिटिश साम्राज्य के ताबूत में कील का काम करेगी.

सिर पर लगी हुई चोट ने लाला लाजपत राय का प्राणान्त कर दिया. उनकी मृत्यु से पूरा देश भड़क उठा. इसी क्रोध के परिणामस्वरूप भगतसिंहशिवराम राजगुरु और सुखदेव थापर  ने अंग्रेज पुलिस अधिकारी सांडर्स की हत्या की और फांसी के फंदे से झूल गए. लाला लाजपत राय भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के उन सेनानियों में से एक रहे जिन्होंने अपना सबकुछ देश को दे दिया. उनका जीवन ढेर सारे कष्टों और संघर्ष की महागाथा ​है, जिसे आने वाली पीढ़ीया युगों तक कहती—सुनती रहेंगी


26 January, 2021

गणतंत्र दिवस

गणतंत्र दिवस




 भारत 15 अगस्त 1947 को स्वतंत्र हुआ था तथा 26 जनवरी 1950 को इसके संविधान को आत्मसात किया गया, जिसके अनुसार भारत देश एक लोकतांत्रिक, संप्रभु तथा गणतंत्र देश घोषित किया गया।

26 जनवरी 1950 को देश के प्रथम राष्ट्रपति डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने 21 तोपों की सलामी के साथ ध्वजारोहण कर भारत को पूर्ण गणतंत्र घोषित किया। यह ऐतिहासिक क्षणों में गिना जाने वाला समय था। इसके बाद से हर वर्ष इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है तथा इस दिन देशभर में राष्ट्रीय अवकाश रहता है।

गणतंत्र राष्‍ट्र के बीज 31 दिसंबर 1929 की मध्‍य रात्रि में भारतीय राष्‍ट्रीय कांग्रेस के लाहौर सत्र में बोए गए थे। यह सत्र पंडित जवाहर लाल नेहरु की अध्‍यक्षता में आयोजि‍त किया गया था। उस बैठक में उपस्थित लोगों ने 26 जनवरी को "स्‍वतंत्रता दिवस" के रूप में अंकित करने की शपथ ली थी ताकि ब्रिटिश राज से पूर्ण स्‍वतंत्रता के सपने को साकार किया जा सके। लाहौर सत्र में नागरिक अवज्ञा आंदोलन का मार्ग प्रशस्‍त किया गया। यह निर्णय लिया गया कि 26 जनवरी 1930 को पूर्ण स्‍वराज दिवस के रूप में मनाया जाएगा। पूरे भारत से अनेक भारतीय राजनैतिक दलों और भारतीय क्रांतिकारियों ने सम्‍मान और गर्व सहित इस दिन को मनाने के प्रति एकता दर्शाई।

भारतीय संविधान सभा की पहली बैठक 9 दिसंबर 1946 को की गई, जिसका गठन भारतीय नेताओं और ब्रिटिश कैबिनेट मिशन के बीच हुई बातचीत के परिणाम स्‍वरूप किया गया था। इस सभा का उद्देश्‍य भारत को एक संविधान प्रदान करना था जो दीर्घ अवधि प्रयोजन पूरे करेगा और इसलिए प्रस्‍तावित संविधान के विभिन्‍न पक्षों पर गहराई से अनुसंधान करने के लिए अनेक समितियों की नियुक्ति की गई। सिफारिशों पर चर्चा, वादविवाद किया गया और भारतीय संविधान पर अंतिम रूप देने से पहले कई बार संशोधित किया गया तथा 3 वर्ष बाद 26 नवंबर 1949 को आधिकारिक रूप से अपनाया गया।

जबकि भारत 15 अगस्‍त 1947 को एक स्‍वतंत्र राष्‍ट्र बना, इसने स्‍वतंत्रता की सच्‍ची भावना का आनन्‍द 26 जनवरी 1950 को उठाया जब भारतीय संविधान प्रभावी हुआ। इस संविधान से भारत के नागरिकों को अपनी सरकार चुनकर स्‍वयं अपना शासन चलाने का अधिकार मिला। डॉ. राजेन्‍द्र प्रसाद ने गवर्नमेंट हाउस के दरबार हाल में भारत के प्रथम राष्‍ट्रपति के रूप में शपथ ली और इसके बाद राष्‍ट्रपति का काफिला 5 मील की दूरी पर स्थित इर्विन स्‍टेडियम पहुंचा जहां उन्‍होंने राष्‍ट्रीय ध्‍वज फहराया।

तब से ही इस ऐतिहासिक दिवस, 26 जनवरी को पूरे देश में एक त्‍यौहार की तरह और राष्‍ट्रीय भावना के साथ मनाया जाता है। इस दिन का अपना अलग महत्‍व है जब भारतीय संविधान को अपनाया गया था। इस गणतंत्र दिवस पर महान भारतीय संविधान को पढ़कर देखें जो उदार लोकतंत्र का परिचायक है, जो इसके भण्‍डार में निहित है। आइए अब गर्व पूर्वक इसे जानें कि हमारे संविधान का आमुख क्‍या कहता है।

395 अनुच्‍छेदों और 8 अनुसूचियों के साथ भारतीय संविधान दुनिया में सबसे बड़ा लिखित संविधान है

26 जनवरी 1950 वह दिन था जब भारतीय गणतंत्र और इसका संविधान प्रभावी हुए। यही वह दिन था जब 1965 में हिन्‍दी को भारत की राजभाषा घोषित किया गया। 

26 जनवरी 1950 को सुबह 10 बजकर 18 मिनट पर भारत का संविधान लागू किया गया था

हमारा संविधान देश के नागरिकों को लोकतांत्रिक तरीके से अपनी सरकार चुनने का अधिकार देता है। संविधान लागू होने के बाद डॉक्टर राजेंद्र प्रसाद ने वर्तमान संसद भवन के दरबार हॉल में राष्ट्रपति की शपथ ली थी और इसके बाद पांच मील लंबे परेड समारोह के बाद इरविन स्टेडियम में उन्होंने राष्‍ट्रीय ध्‍वज फहराया था।

इस अवसर के महत्‍व को दर्शाने के लिए हर वर्ष गणतंत्र दिवस पूरे देश में बड़े उत्‍साह के साथ मनाया जाता है, और राजधानी, नई दिल्‍ली में राष्‍ट्र‍पति भवन के समीप रायसीना पहाड़ी से राजपथ पर गुजरते हुए इंडिया गेट तक और बाद में ऐतिहासिक लाल किले तक शानदार परेड का आयोजन किया जाता है।

आयोजन

यह आयोजन भारत के प्रधानमंत्री द्वारा इंडिया गेट पर अमर जवान ज्‍योति पर पुष्‍प अर्पित करने के साथ आरंभ होता है, जो उन सभी सैनिकों की स्‍मृति में है जिन्‍होंने देश के लिए अपने जीवन कुर्बान कर दिए। इसे शीघ्र बाद 21 तोपों की सलामी दी जाती है, राष्‍ट्रपति महोदय द्वारा राष्‍ट्रीय ध्‍वज फहराया जाता है और राष्‍ट्रीय गान होता है। इस प्रकार परेड आरंभ होती है।

महामहिम राष्‍ट्रपति के साथ एक उल्‍लेखनीय विदेशी राष्‍ट्र प्रमुख आते हैं, जिन्‍हें आयोजन के मुख्‍य अतिथि के रूप में आमंत्रित किया जाता है।

राष्‍ट्रपति महोदय के सामने से खुली जीपों में वीर सैनिक गुजरते हैं। भारत के राष्‍ट्रपति, जो भारतीय सशस्‍त्र बल, के मुख्‍य कमांडर हैं, विशाल परेड की सलामी लेते हैं। भारतीय सेना द्वारा इसके नवीनतम हथियारों और बलों का प्रदर्शन किया जाता है जैसे टैंक, मिसाइल, राडार आदि।

इसके शीघ्र बाद राष्‍ट्रपति द्वारा सशस्‍त्र सेना के सैनिकों को बहादुरी के पुरस्‍कार और मेडल दिए जाते हैं जिन्‍होंने अपने क्षेत्र में अभूतपूर्व साहस दिखाया और ऐसे नागरिकों को भी सम्‍मानित किया जाता है जिन्‍होंने विभिन्‍न परिस्थितियों में वीरता के अलग-अलग कारनामे किए।

इसके बाद सशस्‍त्र सेना के हेलिकॉप्‍टर दर्शकों पर गुलाब की पंखुडियों की बारिश करते हुए फ्लाई पास्‍ट करते हैं।

सेना की परेड के बाद रंगारंग सांस्‍कृतिक परेड होती है। विभिन्‍न राज्‍यों से आई झांकियों के रूप में भारत की समृद्ध सांस्‍कृतिक विरासत को दर्शाया जाता है। प्रत्‍येक राज्‍य अपने अनोखे त्‍यौहारों, ऐतिहासिक स्‍थलों और कला का प्रदर्शन करते है। यह प्रदर्शनी भारत की संस्‍कृति की विविधता और समृद्धि को एक त्‍यौहार का रंग देती है।

विभिन्‍न सरकारी विभागों और भारत सरकार के मंत्रालयों की झांकियां भी राष्‍ट्र की प्र‍गति में अपने योगदान प्रस्‍तुत करती है। इस परेड का सबसे खुशनुमा हिस्‍सा तब आता है जब बच्‍चे, जिन्‍हें राष्‍ट्रीय वीरता पुरस्‍कार हाथियों पर बैठकर सामने आते हैं। पूरे देश के स्‍कूली बच्‍चे परेड में अलग-अलग लोक नृत्‍य और देश भक्ति की धुनों पर गीत प्रस्‍तुत करते हैं।

परेड में कुशल मोटर साइकिल सवार, जो सशस्‍त्र सेना कार्मिक होते हैं, अपने प्रदर्शन करते हैं। परेड का सर्वाधिक प्रतीक्षित भाग फ्लाई पास्‍ट है जो भारतीय वायु सेना द्वारा किया जाता है। फ्लाई पास्‍ट परेड का अंतिम पड़ाव है, जब भारतीय वायु सेना के लड़ाकू विमान राष्‍ट्रपति का अभिवादन करते हुए मंच पर से गुजरते हैं।

गणतंत्र दिवस का आयोजन कुल मिलाकर तीन दिनों का होता है और 27 जनवरी को इंडिया गेट पर इस आयोजन के बाद प्रधानमंत्री की रैली में एनसीसी केडेट्स द्वारा विभिन्‍न चौंका देने वाले प्रदर्शन और ड्रिल किए जाते हैं।

सात क्षेत्रीय सांस्‍कृतिक केन्‍द्रों के साथ मिलकर संस्‍कृति मंत्रालय, भारत सरकार द्वारा हर वर्ष 24 से 29 जनवरी के बीच "लोक तरंग - राष्‍ट्रीय लोक नृत्‍य समारोह" आयोजित किया जाता है। इस आयोजन में लोगों को देश के विभिन्‍न भागों से आए रंग बिरंगे और चमकदार और वास्‍तविक लोक नृत्‍य देखने का अनोखा अवसर मिलता है।

बीटिंग द रिट्रीट गणतंत्र दिवस आयोजनों का आधिकारिक रूप से समापन घोषित करता है। सभी महत्‍वपूर्ण सरकारी भवनों को 26 जनवरी से 29 जनवरी के बीच रोशनी से सुंदरता पूर्वक सजाया जाता है। हर वर्ष 29 जनवरी की शाम को अर्थात गणतंत्र दिवस के बाद अर्थात गणतंत्र की तीसरे दिन बीटिंग द रिट्रीट आयोजन किया जाता है। यह आयोजन तीन सेनाओं के एक साथ मिलकर सामूहिक बैंड वादन से आरंभ होता है जो लोकप्रिय मार्चिंग धुनें बजाते हैं।

ड्रमर भी एकल प्रदर्शन (जिसे ड्रमर्स कॉल कहते हैं) करते हैं। ड्रमर्स द्वारा एबाइडिड विद मी (यह महात्‍मा गांधी की प्रिय धुनों में से एक कहीं जाती है) बजाई जाती है और ट्युबुलर घंटियों द्वारा चाइम्‍स बजाई जाती हैं, जो काफी दूरी पर रखी होती हैं और इससे एक मनमोहक दृश्‍य बनता है।

इसके बाद रिट्रीट का बिगुल वादन होता है, जब बैंड मास्‍टर राष्‍ट्रपति के समीप जाते हैं और बैंड वापिस ले जाने की अनुमति मांगते हैं। तब सूचित किया जाता है कि समापन समारोह पूरा हो गया है। बैंड मार्च वापस जाते समय लोकप्रिय धुन "सारे जहां से अच्‍छा" बजाते हैं।

ठीक शाम 6 बजे बगलर्स रिट्रीट की धुन बजाते हैं और राष्‍ट्रीय ध्‍वज को उतार लिया जाता हैं तथा राष्‍ट्रगान गाया जाता है और इस प्रकार गणतंत्र दिवस के आयोजन का औपचारिक समापन होता हैं।

26 जनवरी 1950 को सुबह 10 बजकर 18 मिनट पर भारत का संविधान लागू किया गया था


 हमें जान से प्यारा यह गणतंत्र हमारा,
याद रखेंगे शहीदों को और बलिदान तुम्हारा।


20 January, 2021

गुरु गोविंदसिंह जयंती

 गुरु गोविंदसिंह जयंती


गुरु गोविंद सिंहजी का जन्म 5 जनवरी 1666 (विक्रम संवत के अनुसार 1723 पौष  शुक्ल  सप्तमी) को पटना साहिब में हुआ था (जन्म तिथि 22 दिसंबर को भी कई स्थानों पर पाई जाती है)


सिख समुदाय के लोग विक्रम संवत के अनुसार जयंती मनाते हैं।


उनके पिता का नाम गुरु तेगबहादुर सिंह और माता का नाम गुजरी था। 

उनके पिता सिखों के 9 वें गुरु थे। 

गुरु गोविंद सिंहजी के बचपन में उन्हें गोविंद राय के नाम से जाना जाता था।


गुरु गोविंद सिंह की जयंती को सिख समुदाय द्वारा प्रकाश पर्व के रूप में मनाया जाता है।

 इस दिन गुरुद्वारों में रोशनी की जाती है। लोग अरदास, भजन, कीर्तन के साथ पूजा करते हैं। सुबह में शहर के लिए एक सुबह की नौका है। लंगर की भी योजना है।

परिवार के लड़के प्यार से गोविंदा को गोविंदा कहते थे। गुरु गोबिंद सिंह ने अपना बचपन पटना में बिताया। वहां वह बचपन में बच्चों के साथ तीर-लड़ाई, कृत्रिम युद्ध जैसे खेल खेल रहे थे। इस वजह से बच्चे उन्हें एक प्रमुख के रूप में स्वीकार करने लगे। उन्हें हिंदी, संस्कृत, फारसी, पुल आदि भाषाओं का जबरदस्त ज्ञान था।

उन्होंने 1699 में वैशाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की और हर सिख को किरपान या श्रीसाहिब पहनना अनिवार्य कर दिया।

उसी समय, गुरु गोबिंद सिंह जीए ने खालसा की आवाज दी। जो वाहेगुरुजी की खालसा वाहेगुरुजी की फतेह है। अपने धर्म की रक्षा के लिए मुगलों से लड़ते हुए, उन्होंने अपने पूरे परिवार का बलिदान कर दिया और अपने दो बेटों, बाबा अजीत सिंह और बाबा जुजर सिंह के साथ चामकौर की लड़ाई में शहीद हो गए।

नवंबर 1675 में, औरंगजेब ने गुरु तेग बहादुर को शहीद कर दिया, फिर नौ साल की छोटी उम्र में अपने पिता की गद्दी संभाली।

गुरु गोबिंद सिंहजी एक बहुत ही निडर और बहादुर योद्धा थे। उनकी बहादुरी के बारे में लिखा गया है कि,

गुरु गोविंद सिंहजी ने खालसा को आवाज दी। जिसे "वाहेगुरु जी की खालसा, वाहेगुरु जी की फतेह" कहा जाता है।

 गुरु गोबिंद सिंह ने जीवन जीने के लिए पांच सिद्धांत भी बताए जिन्हें 'पांच ककार' कहा जाता है. पांच ककार में ये पांच चीजें आती हैं जिन्हें खालसा सिख धारण करते हैं. ये हैं- 'केश', 'कड़ा', 'कृपाण', 'कंघा' और 'कच्छा'. इन पांचो के बिना खालसा वेश पूर्ण नहीं माना जाता है.

उसने अपने धर्म की रक्षा के लिए मुगलों से लड़ते हुए अपने पूरे परिवार का बलिदान कर दिया। उनके दो बेटे बाबा अजीत सिंह और बाबा जुझार सिंह चामकौर की लड़ाई में शहीद हो गए। उसी समय, सरहिंद के नवाब द्वारा दो अन्य पुत्रों, बाबा जोरावर सिंह और फतेह सिंह को जीवित दीवारों में बांध दिया गया।

खालसा पंथ की स्थापना वर्ष 1699 में सिख गुरु गोबिंद सिंह जीए ने की थी। इसे सिखों के इतिहास की सबसे महत्वपूर्ण घटना माना जाता है। यह गुरु गोबिंद सिंह थे जिन्होंने गुरु परंपरा को समाप्त किया और सिख लोगों के गुरु ग्रंथ साहिब की घोषणा की।

खालसा पंथ की स्थापना-

सिखों के दसवें गुरु गुरु गोविंद सिंह ने ही साल 1699 में बैसाखी के दिन खालसा पंथ की स्थापना की थी

कहा जाता है कि एक दिन जब सभी लोग इकट्ठा हुए, तो गुरु गोविंद सिंह ने कुछ मांग की, ताकि वहां सन्नाटा हो। सभा में उपस्थित लोगों ने गुरु गोबिंद सिंह के सिर की मांग की। गुरु गोबिंद सिंह ने कहा कि वह एक सिर चाहते थे।

जिसके बाद एक के बाद एक पांच लोग खड़े हो गए और कहा कि सिर मौजूद है। इसलिए जैसे ही हम तम्बू के अंदर गए, वहाँ से खून बहने लगा। यह देखकर बाकी लोग बेचैन हो गए।

जब गुरु गोबिंद सिंह आखिरकार अकेले तंबू के अंदर गए और वापस लौटे, तो लोग चकित रह गए। पांचों युवक उनके साथ थे, नए कपड़े और पगड़ी पहने हुए थे। गुरु गोविंद सिंह उनकी परीक्षा ले रहे थे। गुरु गोविंद ने 5 युवाओं को अपने पंच प्यारे बुलाया और घोषणा की कि अब से हर सिख कडू, कृपाल, कच्छो, बाल और कंघी पहनेंगे। यहाँ से खालसा पंथ की स्थापना हुई। खालसा का अर्थ है शुद्ध।

उन्होंने खालसा वाणी - "वाहेगुरु जी का खालसा, वाहेगुरु जी की फतह" भी दी.


गुरु गोविंद के 5 प्रेरणादायक विचार -

वादा या रखना - यदि आपने किसी से वादा किया है, तो उसे हर कीमत पर रखा जाना चाहिए

निन्दा, निंदा और ईर्ष्या - हमें किसी से भी गपशप या चुगली करने से बचना चाहिए और ईर्ष्या करने के बजाय मेहनत करने से हमें फायदा होता है।

गरीब मत बनो - कड़ी मेहनत करो और लापरवाही मत करो।

गुरुबानी कंठ करणी - गुरुबानी याद रखें

तीथिंग - अपनी कमाई का दसवां हिस्सा दान करें।

देश, धर्म और संस्कृति का बचाव करते हुए, काज ने नौ साल की उम्र में अपने पिता और नौ साल की उम्र में अपने चार बेटों की बलि दे दी। इसीलिए पूरे परिवार को दानी कहा जाता है।

गुरु गोबिंद सिंहजी ने धर्म की रक्षा के लिए अपने पूरे परिवार का बलिदान कर दिया। उसके दो बेटों को जिंदा दीवारों में बांध दिया गया। 

अक्टूबर 1708 में उनकी मृत्यु हो गई। तब से, गुरु ग्रंथ साहिब सिखों के स्थायी गुरु बन गए हैं।


10 January, 2021

विश्व हिंदी दिवस (World Hindi Day)

 


विश्व हिंदी दिवस (World Hindi Day)  हर साल 10 जनवरी को मनाया जाता है. 


विश्व हिंदी दिवस (World Hindi Day 2019) का उद्देश्य विश्‍व भर में हिंदी के प्रचार-प्रसार के लिए वातावरण निर्मित‍ करना और हिंदी को अंतरराष्‍ट्रीय भाषा के रूप में पेश करना है. 


हिंदी भाषा को 14 सितम्बर 1949 को संविधान सभा के द्वारा आजाद भारत की मुख्य भाषा के रूप में पहचान दी गई थी।


भारत में करीब 77 प्रतिशत आबादी हिंदी बोलती है।


विदेशों में भारत के दूतावास इस दिन को विशेष रूप से मनाते हैं. इस दिन सभी सरकारी कार्यालयों में विभिन्न विषयों पर हिंदी के लिए अनूठे कार्यक्रम आयोजित किए जाते हैं.


 विश्व हिंदी दिवस  मनाने की शुरुआत पूर्व प्रधानमंत्री डॉक्‍टर मनमोहन सिंह ने 10 जनवरी 2006 को की थी. तभी से हर साल 10 जनवरी को विश्व हिंदी दिवस (Vishv Hindi Divas) मनाया जाता है. 


हिंदी सिर्फ भारत ही नहीं बल्कि पाकिस्तान, नेपाल और बांग्लादेश में भी बोली और समझी जाती है। करीब 60 करोड़ लोग हिंदी बोलते हैं, इनमें से 26 करोड़ लोगों की यह मातृभाषा है।


हिंदी और उर्दू भाषाओको एकदूजे की भगिनी कहा जाता है क्योंकि दोनों के व्याकरण ओर शब्दभंडार में समानता है।


संविधान द्वारा हिंदी को भारत की राजभाषा का दर्जा दिये जाने की खुशी में हम हिंदी दिवस मनाते हैं। संविधान के अनुच्छेद 343 में हिंदी भाषा को राजभाषा के तौर पर अपनाने का उल्लेख मिलता है।


 विश्व हिंदी दिवस (World Hindi Diwas) के अलावा हर साल 14 सितंबर को 'हिंदी दिवस' (Hindi Diwas) मनाया जाता है.


1975 में तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने प्रथम विश्व हिंदी सम्मेलन का उद्घाटन किया था.


दुनिया भर में हिंदी (Hindi) के प्रचार-प्रसार के लिए पहला विश्‍व हिंदी सम्‍मेलन 10 जनवरी 1975 को नागपुर में आयोजित किया गया था. 


इसलिए इस दिन को विश्‍व हिंदी दिवस के रूप में मनाया जाता है. इस सम्मेलन में 30 देशों के 122 प्रतिनिधि शामिल हुए थे. 2006 के बाद से हर साल 10 जनवरी को विश्वभर में विश्व हिंदी दिवस मनाया जाता है


नॉर्वे में पहला विश्व हिंदी दिवस भारतीय दूतावास ने मनाया था. इसके बाद दूसरा और तीसरा विश्व हिंदी दिवस भारतीय नॉर्वेजीय सूचना एवं सांस्कृतिक फोरम के तत्वाधान में लेखक सुरेशचन्द्र शुक्ल की अध्यक्षता में बहुत धूमधाम से मनायागया था.


 14 सितंबर 1949 को संविधान सभा ने हिंदी को राजभाषा का दर्जा दिया था तभी से 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है.


हिंदी दुनिया भर में सबसे ज्‍यादा बोली जाने वाली पांच भाषाओं में से एक है


दक्षिण प्रशान्त महासागर के मेलानेशिया में फिजी नाम का एक द्वीप है. फिजी में हिंदी को आधाकारिक भाषा का दर्जा दिया गया है. इसे फि‍जियन हिंदी या फि‍जियन हिन्दुस्तानी भी कहते हैं. 

पाकिस्‍तान, नेपाल, बांग्‍लादेश, अमेरिका, ब्रिटेन, जर्मनी, न्‍यूजीलैंड, संयुक्‍त अरब अमीरात, युगांडा, गुयाना, सूरीनाम, त्रिनिदाद, मॉरिशस और साउथ अफ्रीका समेत कई देशों में हिंदी बोली जाती है.


साल 2017 में ऑक्‍सफोर्ड डिक्‍शनरी में पहली बार 'अच्छा', 'बड़ा दिन', 'बच्चा' और 'सूर्य नमस्कार' जैसे हिंदी शब्‍दों को शामिल किया गया. चमचा', 'नाटक' ओर जय शब्द को भी रखा गया है।

2017 में ऑक्सफोर्ड डिक्शनरी में भारतीय भाषाओं के 70 शब्द जोड़े गए


विश्व आर्थिक मंच की गणना के अनुसार हिंदी विश्व की दस शक्तिशाली भाषाओं में से एक है.


विश्वभर के करीब 176 विश्वविद्यालयों में हिंदी एक विषय के तौर पर पढ़ाई जाती है।


इसे जिस प्रकार से लिखा जाता है बिल्कुल उसी प्रकार से बोला भी जाता है। हिंदी भारत की राजभाषा भी है। हिंदी विश्व में चौथे नंबर की सबसे ज्यादा बोली जाने वाली भाषाओं में से एक है।अंग्रेजी, स्पेनिश, चीनी भाषा के बाद हिंदी पूरे विश्व के कई कोनों में बोली जाती है।






इस वक्त पूरी दुनिया में 26 हिंदी चेयर चल रहे हैं,


हिंदी भाषा की सबसे छोटी इकाई ध्वनि होती है। इसी ध्वनि को ही वर्ण कहा जाता है। वर्णों को व्यवस्थित करने के समूह को वर्णमाला कहते हैं। हिंदी में उच्चारण के आधार पर 45 वर्ण होते हैं। इनमें 10 स्वर और 35 व्यंजन होते हैं। लेखन के आधार पर 52 वर्ण होते हैं इसमें 13 स्वर , 35 व्यंजन तथा 4 संयुक्त व्यंजन होते हैं। वर्णमाला के दो भाग होते हैं :- 1. स्वर 2. व्यंजन 1. स्वर क्या होता है :- जिन वर्णों को स्वतंत्र रूप से बोला जा सके उसे स्वर कहते हैं। परम्परागत रूप से स्वरों की संख्या 13 मानी गई है लेकिन उच्चारण की दृष्टि से 10 ही स्वर होते हैं। 1. उच्चारण के आधार पर स्वर :- अ, आ , इ , ई , उ , ऊ , ए , ऐ , ओ , औ आदि। 2. लेखन के आधार पर स्वर :- अ, आ, इ , ई , उ , ऊ , ए , ऐ , ओ , औ , अं , अ: , ऋ आदि। व्यंजन क्या होता है :- जो वर्ण स्वरों की सहायता से बोले जाते हैं उन्हें व्यंजन कहते हैं। हर व्यंजन के उच्चारण में अ स्वर लगा होता है। अ के बिना व्यंजन का उच्चारण नहीं हो सकता। वर्णमाला में कुल 35 व्यंजन होते हैं। कवर्ग : क , ख , ग , घ , ङ चवर्ग : च , छ , ज , झ , ञ टवर्ग : ट , ठ , ड , ढ , ण ( ड़ ढ़ ) तवर्ग : त , थ , द , ध , न पवर्ग : प , फ , ब , भ , म अंतस्थ : य , र , ल , व् उष्म : श , ष , स , ह संयुक्त व्यंजन : क्ष , त्र , ज्ञ , श्र यह वर्णमाला देवनागरी लिपि में लिखी गई है। देवनागरी लिपि में संस्कृत , मराठी , कोंकणी , नेपाली , मैथिलि भाषाएँ लिखी जाती हैं। हिंदी वर्णमाला में ऋ , ऌ , ॡ का प्रयोग नहीं किया जाता है।
 



इस मौके पर शिवराज सिंह चौहान समेत तमाम लोग हिन्दी के मूर्धन्य लेखक और कवि भारतेन्दु हरिश्चंद्र की यह प्रसिद्ध पंक्ति शेयर कर रहे हैं


निज भाषा उन्नति अहै, 

सब उन्नति को मूल बिन निज भाषा-ज्ञान के,

 मिटत न हिय को सूल।। 

            - भारतेन्दु हरिश्चंद्र







22 December, 2020

महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन

 महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन




श्रीनिवास रामानुजन् इयंगर (22 दिसम्बर, 1887 – 26 अप्रैल, 1920) एक महान भारतीयगणितज्ञ थे। इन्हें आधुनिक काल के महानतम गणित विचारकों में गिना जाता है। इन्हें गणित में कोई विशेष प्रशिक्षण नहीं मिला, फिर भी इन्होंने विश्लेषण एवं संख्या सिद्धांत के क्षेत्रों में गहन योगदान दिए। इन्होंने अपने प्रतिभा और लगन से न केवल गणित के क्षेत्र में अद्भुत अविष्कार किए वरन भारत को अतुलनीय गौरव भी प्रदान किया।


ये बचपन से ही विलक्षण प्रतिभावान थे। इन्होंने खुद से गणित सीखा और अपने जीवनभर में गणित के 3,884 प्रमेयों का संकलन किया। इनमें से अधिकांश प्रमेय सही सिद्ध किये जा चुके हैं। इन्होंने गणित के सहज ज्ञान और बीजगणित प्रकलन की अद्वितीय प्रतिभा के बल पर बहुत से मौलिक और अपारम्परिक परिणाम निकाले जिनसे प्रेरित शोध आज तक हो रहा है, यद्यपि इनकी कुछ खोजों को गणित मुख्यधारा में अब तक नहीं अपनाया गया है। हाल में इनके सूत्रों को क्रिस्टल-विज्ञान में प्रयुक्त किया गया है। इनके कार्य से प्रभावित गणित के क्षेत्रों में हो रहे काम के लिये रामानुजन जर्नल की स्थापना की गई है।


महान गणितज्ञ श्रीनिवास रामानुजन का जन्म 22 दिसम्बर 1887 को मद्रास से 400 किमी दूर इरोड नामक एक छोटे से गांव में हुआ था। रामानुजन जब एक वर्ष के थे तभी उनका परिवार पवित्र तीर्थस्थल कुंभकोणम में आकर बस गया था। इनके पिता यहाँ एक कपड़ा व्यापारी की दुकान में मुनीम का कार्य करते थे। पाँच वर्ष की आयु में रामानुजन का दाखिला कुंभकोणम के प्राथमिक विद्यालय में करा दिया गया।


इनकी प्रारंभिक शिक्षा की एक रोचक घटना है। गणित के अध्यापक कक्षा में भाग की क्रिया समझा रहे थे। उन्होंने प्रश्न किया कि अगर तीन केले तीन विद्यार्थियों में बांटे जाये तो हरेक विद्यार्थी के हिस्से में कितने केले आयेंगे? विद्यार्थियों ने तत्काल उत्तर दिया कि हरेक विद्यार्थी को एक-एक केला मिलेगा। इस प्रकार अध्यापक ने समझाया कि अगर किसी संख्या को उसी संख्या से भाग दिया जाये तो उसका उत्तर एक होगा। लेकिन तभी कोने में बैठे रामानुजन ने प्रश्न किया कि, यदि कोई भी केला किसी को न बाँटा जाए, तो क्या तब भी प्रत्येक विद्यार्थी को एक केला मिल सकेगा? सभी विद्यार्थी इस प्रश्न को सुनकर हँस पड़े, क्योंकि उनकी दृष्टि में यह प्रश्न मूर्खतापूर्ण था। लेकिन बालक रामानुजन द्वारा पूछे गए इस गूढ़ प्रश्न पर गणितज्ञ सदियों से विचार कर रहे थे। प्रश्न था कि अगर शून्य को शून्य से विभाजित किया जाए तो परिणाम क्या होगा? भारतीय गणितज्ञ भास्कराचार्य ने कहा था कि अगर किसी संख्या को शून्य से विभाजित किया जाये तो परिणाम `अनन्त’ होगा। रामानुजन ने इसका विस्तार करते हुए कहा कि शून्य का शून्य से विभाजन करने पर परिणाम कुछ भी हो सकता है अर्थात् वह परिभाषित नहीं है। रामानुजन की प्रतिभा से अध्यापक बहुत प्रभावित हुए।


प्रारंभिक शिक्षा के बाद इन्होंने हाई स्कूल में प्रवेश लिया। यहाँ पर तेरह वर्ष की अल्पावस्था में इन्होने ‘लोनी’ कृत विश्व प्रसिद्ध ‘त्रिकोणमिति’ को हल किया और पंद्रह वर्ष की अवस्था में जार्ज शूब्रिज कार कृत `सिनोप्सिस ऑफ़ एलिमेंट्री रिजल्टस इन प्योर एण्ड एप्लाइड मैथेमैटिक्स’ का अध्ययन किया। इस पुस्तक में दी गयी लगभग पांच हज़ार प्रमेयों को रामानुजन ने सिद्ध किया और उनके आधार पर नए प्रमेय विकसित किये। इसी समय से रामानुजन ने अपनी प्रमेयों को नोटबुक में लिखना शुरू कर दिया था। हाई स्कूल में अध्ययन के लिए रामानुजन को छात्रवृत्ति मिलती थी परंतु रामानुजन के द्वारा गणित के अलावा दूसरे सभी विषयों की उपेक्षा करने पर उनकी छात्रवृत्ति बंद कर दी गई। उच्च शिक्षा के लिए रामानुजन मद्रास विश्वविद्यालय गए परंतु गणित को छोड़कर शेष सभी विषयों में वे अनुत्तीर्ण हो गए। इस तरह रामानुजन की औपचारिक शिक्षा को एक पूर्ण विराम लग गया। लेकिन रामानुजन ने गणित में शोध करना जारी रखा।


कुछ समय उपरांत इनका विवाह हो गया गया और वे आजीविका के लिए नौकरी खोजने लगे। इस समय उन्हें आर्थिक तंगी से गुजरना पड़ा। लेकिन नौकरी खोजने के दौरान रामानुजन कई प्रभावशाली व्यक्तियों के सम्पर्क में आए। ‘इंडियन मेथमेटिकल सोसायटी’ के संस्थापकों में से एक रामचंद्र राव भी उन्हीं प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक थे। रामानुजन ने रामचंद्र राव के साथ एक वर्ष तक कार्य किया। इसके लिये इन्हें 25 रू. महीना मिलता था। इन्होंने ‘इंडियन मेथमेटिकल सोसायटी’ की पत्रिका (जर्नल) के लिए प्रश्न एवं उनके हल तैयार करने का कार्य प्रारंभ कर दिया। सन् 1911 में बर्नोली संख्याओं पर प्रस्तुत शोधपत्र से इन्हें बहुत प्रसिद्धि मिली और मद्रास में गणित के विद्वान के रूप में पहचाने जाने लगे। सन् 1912 में रामचंद्र राव की सहायता से मद्रास पोर्ट ट्रस्ट के लेखा विभाग में लिपिक की नौकरी करने लगे। सन् 1913 में इन्होंने जी. एम. हार्डी को पत्र लिखा और उसके साथ में स्वयं के द्वारा खोजी प्रमेयों की एक लम्बी सूची भी भेजी।


यह पत्र हार्डी को सुबह नाश्ते के टेबल पर मिले। इस पत्र में किसी अनजान भारतीय द्वारा बहुत सारे प्रमेय बिना उपपत्ति के लिखे थे, जिनमें से कई प्रमेय हार्डी पहले ही देख चुके थे। पहली बार देखने पर हार्डी को ये सब बकवास लगा। उन्होंने इस पत्र को एक तरफ रख दिया और अपने कार्यों में लग गए परंतु इस पत्र की वजह से उनका मन अशांत था। इस पत्र में बहुत सारे ऐसे प्रमेय थे जो उन्होंने न कभी देखे और न सोचे थे। उन्हें बार-बार यह लग रहा था कि यह व्यक्ति या तो धोखेबाज है या फिर गणित का बहुत बड़ा विद्वान। रात को हार्डी ने अपने एक शिष्य के साथ एक बार फिर इन प्रमेयों को देखा और आधी रात तक वे लोग समझ गये कि रामानुजन कोई धोखेबाज नहीं बल्कि गणित के बहुत बड़े विद्वान हैं, जिनकी प्रतिभा को दुनिया के सामने लाना आवश्यक है। इसके बाद हार्डी और रामानुजन में पत्रव्यवहार शुरू हो गया। हार्डी ने रामानुजन को कैम्ब्रिज आकर शोध कार्य करने का निमंत्रण दिया। रामानुजन का जन्म ब्राह्मण कुल में हुआ था। वह धर्म-कर्म को मानते थे और कड़ाई से उनका पालन करते थे। वह सात्विक भोजन करते थे। उस समय मान्यता थी कि समुद्र पार करने से धर्म भ्रष्ट हो जाएगा। इसलिए रामानुजन ने कैम्ब्रिज जाने से इंकार कर दिया। लेकिन हार्डी ने प्रयास जारी रखा और मद्रास जा रहे एक युवा प्राध्यापक नेविल को रामानुजन को मनाकर कैम्ब्रिज लाने के लिए कहा। नेविल और अन्य लोगों के प्रयासों से रामानुजन कैम्ब्रिज जाने के लिए तैयार हो गए। हार्डी ने रामानुजन के लिए केम्ब्रिज के ट्रिनिटी कॉलेज में व्यवस्था की।


जब रामानुजन ट्रिनिटी कॉलेज गए तो उस समय पी.सी. महलानोबिस [प्रसिद्ध भारतीय सांख्यिकी विद] भी वहां पढ़ रहे थे। महलानोबिस रामानुजन से मिलने के लिए उनके कमरे में पहुंचे। उस समय बहुत ठंड थी। रामानुजन अंगीठी के पास बैठे थे। महलानोबिस ने उन्हें पूछा कि रात को ठंड तो नहीं लगी। रामानुजन ने बताया कि रात को कोट पहनकर सोने के बाद भी उन्हें ठंड लगी। उन्होंने पूरी रात चादर ओढ़ कर काटी थी क्योंकि उन्हें कम्बल दिखाई नहीं दिया। महलानोबिस उनके शयन कक्ष में गए और पाया कि वहां पर कई कम्बल हैं। अंग्रेजी शैली के अनुसार कम्बलों को बिछाकर उनके ऊपर चादर ढकी हुई थी। जब महलानोबिस ने इस अंग्रेजी शैली के बारे में बताया तो रामानुजन को अफ़सोस हुआ। वे अज्ञानतावश रात भर चादर ओढ़कर ठंड से ठिठुरते रहे। रामानुजन को भोजन के लिए भी कठिन परेशानी से गुजरना पड़ा। शुरू में वे भारत से दक्षिण भारतीय खाद्य सामग्री मंगाते थे लेकिन बाद में वह बंद हो गयी। उस समय प्रथम विश्वयुद्ध चल रहा था। रामानुजन सिर्फ चावल, नमक और नीबू-पानी से अपना जीवन निर्वाह करने लगे। शाकाहारी होने के कारण वे अपना भोजन खुद पकाते थे। उनका स्वभाव शांत और जीवनचर्या शुद्ध सात्विक थी।


रामानुजन ने गणित में सब कुछ अपने बलबूते पर ही किया। इन्हें गणित की कुछ शाखाओं का बिलकुल भी ज्ञान नहीं था पर कुछ क्षेत्रों में उनका कोई सानी नहीं था। इसलिए हार्डी ने रामानुजन को पढ़ाने का जिम्मा स्वयं लिया। स्वयं हार्डी ने इस बात को स्वीकार किया कि जितना उन्होंने रामानुजन को सिखाया उससे कहीं ज्यादा रामानुजन ने उन्हें सिखाया। सन् 1916 में रामानुजन ने केम्ब्रिज से बी. एस-सी. की उपाधि प्राप्त की।


रामानुजन और हार्डी के कार्यों ने शुरू से ही महत्वपूर्ण परिणाम दिये। सन् 1917 से ही रामानुजन बीमार रहने लगे थे और अधिकांश समय बिस्तर पर ही रहते थे। इंग्लैण्ड की कड़ी सर्दी और कड़ा परिश्रम उनके स्वास्थ्य के लिए हानिकारक सिद्ध हुई। इनका स्वास्थ्य खराब रहने लगा और उनमें तपेदिक के लक्षण दिखाई देने लगे। इधर उनके लेख उच्चकोटि की पत्रिकाओं में प्रकाशित होने लगे थे। सन् 1918 में, एक ही वर्ष में रामानुजन को कैम्ब्रिज फिलोसॉफिकल सोसायटी, रॉयल सोसायटी तथा ट्रिनिटी कॉलेज, कैम्ब्रिज तीनों का फेलो चुन गया। इससे रामानुजन का उत्साह और भी अधिक बढ़ा और वह शोध कार्य में जोर-शोर से जुट गए। सन् 1919 में स्वास्थ बहुत खराब होने की वजह से उन्हें भारत वापस लौटना पड़ा।


रामानुजन की स्मरण शक्ति गजब की थी। वे विलक्षण प्रतिभा के धनी और एक महान गणितज्ञ थे। एक बहुत ही प्रसिद्ध घटना है। जब रामानुजन अस्पताल में भर्ती थे तो डॉ. हार्डी उन्हें देखने आए। डॉ. हार्डी जिस टैक्सी में आए थे उसका नम्बर था 1729 । यह संख्या डॉ. हार्डी को अशुभ लगी क्योंकि 1729 = 7 x 13 x 19 और इंग्लैण्ड के लोग 13 को एक अशुभ संख्या मानते हैं। परंतु रामानुजन ने कहा कि यह तो एक अद्भुत संख्या है। यह वह सबसे छोटी संख्या है, जिसे हम दो घन संख्याओं के जोड़ से दो तरीके में व्यक्त कर सकते हैं। (1729 = 12x12x12 + 1x1x1,और 1729 = 10x10x10 + 9x9x9)।


सन् 1903 से 1914 के बीच, कैम्ब्रिज जाने से पहले रामानुजन अपनी `नोट बुक्स’ में तीन हज़ार से ज्यादा प्रमेय लिख चुके थे। उन्होंने ज्यादातर अपने निष्कर्ष ही दिए थे और उनकी उपपत्ति नहीं दी। सन् 1967 में प्रोफेसर ब्रूस सी. बर्नाड्ट को जब ‘रामानुजन नोट बुक्स’ दिखाई गयी तो उस समय उन्होंने इस पुस्तक में कोई रुचि नहीं ली। बाद में उन्हें लगा कि वह रामानुजन के प्रमेयों की उत्पत्तियाँ दे सकते हैं। प्रोफेसर बर्नाड्ट ने अपना पूरा ध्यान रामानुजन की पुस्तकों के शोध में लगा दिया। उन्होंने रामानुजन की तीन पुस्तकों पर 20 वर्षों तक शोध किया।


सन् 1919 में इंग्लैण्ड से वापस आने के पश्चात् रामानुजन 3 महीने मद्रास, 2 महीने कोदमंडी और 4 महीने कुंभकोणम में रहे। उनकी पत्नी ने उनकी बहुत सेवा की। पति-पत्नी का साथ बहुत कम समय तक रहा। रामानुजन के इंग्लैंड जाने से पूर्व वे एक वर्ष तक उनके साथ रही और वहां से आने के एक वर्ष के अन्दर ही परमात्मा ने पति को सदा के लिए उनसे छीन लिया। उन्हें माँ होने का सुख भी प्राप्त नहीं हुआ। 26 अप्रैल 1920 को 32 वर्ष 4 महीने और 4 दिन की अल्पायु में रामानुजन का शरीर परब्रह्म में विलीन हो गया।


गणितीय कार्य एवं उपलब्धियाँ

रामानुजन ने इंग्लैण्ड में पाँच वर्षों तक मुख्यतः संख्या सिद्धान्त के क्षेत्र में काम किया।



‘रामानुजन संख्या’ उस प्राकृतिक संख्या को कहते हैं जिसे दो अलग-अलग प्रकार से दो संख्याओं के घनों के योग द्वारा निरूपित किया जा सकता है।


उदाहरण – 9^3 + 10^3 = 1^3 + 12^3 = 1729.


इसी प्रकार,


2^3 + 16^3 = 9^3 + 15^3 = 4 104

10^3 + 27^3 = 19^3 + 24^3 = 20 683

2^3+ 34^3 = 15^3 + 33^3 = 39 312

9^3 + 34^3 = 16^3 + 33^3 = 40 033

अतः 1729, 4104, 20683, 39312, 40033 आदि रामानुजन संख्याएं हैं।


सम्मान

राष्ट्रीय गणित दिवस


भारत में प्रत्येक वर्ष 22 दिसम्बर को महान गणितज्ञ श्रीनिवास अयंगर रामानुजन की स्मृति में ‘राष्ट्रीय गणित दिवस’ के रूप में मनाया जाता है ।

प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने २२ दिसंबर २०१२ को मद्रास विश्वविद्यालय में श्रीनिवास रामानुजन की १२५ वीं जयंती के उद्घाटन समारोह के दौरान २२ दिसंबर को "राष्ट्रीय गणित दिवस" ​​घोषित किया और २०१२ को गणित वर्ष के रूप में घोषित किया।


भारतीय डाक विभाग द्वारा 3 दिसंबर, 2011 और 3 दिसंबर, 2016 को रामानुजन के सम्मान में जारी स्मारक डाक टिकट जारी किए गए हैं।



जीवन पर बनी फ़िल्म : द मैन हू न्यू इनफिनिटी


यह फिल्म एक बॉयोपिक है और रामानुजन की जिंदगी पर आधारित है।


पहले विश्वयुद्ध के समय पर बनी, फिल्म रॉबर्ट कनिगेल की किताब पर आधारित है। फिल्म की कहानी ऐसी दोस्ती पर आधारित है जिसने हमेशा के लिए गणित की दुनिया को बदलकर रख दिया। रामानुजन एक गरीब स्वयं पढ़ने वाले भारतीय गणितज्ञ थे। फिल्म की कहानी उनके ट्रिनिटी कॉलेज मद्रास से कैंब्रिज जाने की है।


कैंब्रिज पहुंचने के बाद, रामानुजन और उनके प्रोफेसर जीएच हार्डी के साथ उनका बांड बन जाता है। फिल्म में दिखाया गया है कि कैसे वह विश्वप्रसिद्ध गणितज्ञ बने। देविका भिसे, रामानुजन की पत्नी का किरदार निभा रही हैं। देविका एक शास्त्रीय नृत्यांगना हैं। देविका ने अपनी भूमिका के लिए बहुत अध्ययन किया। उन्होंने किताब के लेखर रॉबर्ट कनिगेल से भी बातचीत की, जो असली जानकी (रामानुजन की पत्नी) से मिल चुके हैं।


एडवर्ड आर प्रेसमैन/एनीमस फिल्मस प्रोडक्शन और कैयेने पेपर प्रोडक्शन द्वारा निर्मित, द मैन हू न्यू इनफीनिटी में देव पटेल, जेरेमी आयरंस, देविका भिसे, स्टेफन फ्राय, टॉबी जॉंस और अरूंधती नाग की मुख्य भूमिकाएं हैं। फिल्म की कहानी लेखन और निर्देशन मैथ्यू ब्राउन ने किया है। फिल्म तमिल और अंग्रेजी में उपलब्ध है।


 




27 November, 2020

हरिवंश राय बच्चन जीवनी

 


 हरिवंश राय बच्चन हिन्दी भाषा के एक कवि और लेखक है

भारतीय फिल्म उद्योग के प्रख्यात अभिनेता अमिताभ बच्चन उनके सुपुत्र हैं

 हरिवंश राय  बच्चन हिन्दी कविता के उत्तर छायावत काल के प्रमुख कवियों में से एक हैं। 

उनकी सबसे प्रसिद्ध कृति मधुशाला है।

हरिवंश राय बच्चन का जन्म 27 नवम्बर 1907 को इलाहाबाद में एक कायस्थ परिवार मे हुआ था।

 इनके पिता का नाम प्रताप नारायण श्रीवास्तव तथा माता का नाम सरस्वती देवी था। 

14 November, 2020

जवाहरलाल नेहरू जीवनी

 जवाहरलाल नेहरू


नाम : जवाहरलाल मोतीलाल नेहरु।

जन्म : 14 नवंबर 1889 इलाहबाद, उत्तर-पश्चिमी प्रान्त, ब्रिटिश भारत ।

मृत्यु : 27 मई 1964 (उम्र 74) नई दिल्ली, भारत।

पिता : मोतीलाल नेहरु।

माता : स्वरूपरानी नेहरु।



        जवाहरलाल नेहरु भारत के पहले प्रधानमंत्री और स्वतंत्रता के पहले और बाद में भारतीय राजनीती के मुख्य केंद्र बिंदु थे। वे महात्मा गाँधी के सहायक के तौर पर भारतीय स्वतंत्रता अभियान के मुख्य नेता थे जो अंत तक भारत को स्वतंत्र बनाने के लिए लड़ते रहे और स्वतंत्रता के बाद भी 1964 में अपनी मृत्यु तक देश की सेवा की। उन्हें आधुनिक भारत का रचयिता माना जाता था। पंडित संप्रदाय से होने के कारण उन्हें पंडित नेहरु भी कहा जाता था। जबकि बच्चो से उनके लगाव के कारण बच्चे उन्हें “चाचा नेहरु” के नाम से जानते थे।

07 November, 2020

चन्द्रशेखर वेंकट रमन जीवनी

 



नाम : चंद्रशेखर वेंटक रमन

जन्म : 7 नवंबर, 1888.
जन्म : तिरुचिरापल्ली (तमिलनाडू).
पिता : चंद्रशेखर अय्यर.
माता : पार्वती अम्मल.
शिक्षा : 1906 में M.Sc. (भौतिक शास्त्र).
पत्नी : लोकसुंदरी.

आरम्भिक जीवन :

        चन्द्रशेखर वेंकटरमन का जन्म ७ नवम्बर सन् १८८८ ई. में तमिलनाडु के तिरुचिरापल्ली नामक स्थान में हुआ था। आपके पिता चन्द्रशेखर अय्यर एस. पी. जी. कॉलेज में भौतिकी के प्राध्यापक थे। आपकी माता पार्वती अम्मल एक सुसंस्कृत परिवार की महिला थीं। सन् १८९२ ई. मे आपके पिता चन्द्रशेखर अय्यर विशाखापतनम के श्रीमती ए. वी.एन. कॉलेज में भौतिकी और गणित के प्राध्यापक होकर चले गए। उस समय आपकी अवस्था चार वर्ष की थी। आपकी प्रारम्भिक शिक्षा विशाखापत्तनम में ही हुई। वहाँ के प्राकृतिक सौंदर्य और विद्वानों की संगति ने आपको विशेष रूप से प्रभावित किया।

02 October, 2020

गांधी जयंती



नाम: मोहनदास करमचंद गांधी

जन्म: २ अक्टूबर १ :६ ९

निधन: 30 जनवरी 1948

जन्म स्थान: पोरबंदर (गुजरात)

पिता का नाम: करमचंद गांधी

माता का नाम: पुतलीबाई

पत्नी का नाम: कस्तूरबा


आज 2 अक्टूबर है, जब इस दिन को गांधी जयंती के रूप में मनाया जाता है। भारत के राष्ट्रपिता महात्मा गांधी का जन्म इसी खास दिन पर हुआ था। साथ ही यह दिन पूरे देश में अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में मनाया जाता है। लोग प्यार से उन्हें बापू कहते थे। भारत को आजादी दिलाने वाले गांधीजी को 'राष्ट्रपिता' के रूप में भी जाना जाता है।


12 वीं में अल्फ्रेड हाई स्कूल, राजकोट से मैट्रिक किया। शामलदास कॉलेज, भावनगर में अपना पहला सेमेस्टर पूरा करने के बाद, वह 19 में लंदन पहुंचे और 181 में बैरिस्टर के रूप में वापस आए। राजकोट और मुंबई में असफल वकालत के बाद, वह 19 वीं में अफ्रीका गए। 18 वीं में, उन्होंने वहां के हिंदुओं के अधिकारों के लिए नेटल इंडियन कांग्रेस की स्थापना की। संघर्ष के दौरान, रस्किन और टॉलस्टॉय के सादगी और आत्मनिर्भरता के सिद्धांतों पर आधारित, उन्होंने 1908 में फीनिक्स मठ और 1910 में टॉलस्टॉय फार्म को जीवन के एक नए तरीके के लिए स्थापित किया। 1905 से 1919 तक दक्षिण अफ्रीका में इंडियन ओपिनियन वीकली का संपादन किया। 1914 में भारत लौटने के बाद, उन्होंने अहमदाबाद में सत्याग्रह आश्रम की स्थापना की। 1917 में, उन्होंने बिहार के चंपारण में गन्ने की खेती करने वाले भारतीयों के लिए अंग्रेजों के खिलाफ पहली लड़ाई लड़ी। तब अहमदाबाद के मिल मजदूरों की हड़ताल तेज हो गई थी। 1917 में खेड़ा सत्याग्रह मनाया गया। 1917 में रोलेट एक्ट के खिलाफ देश भर में विरोध प्रदर्शन और प्रार्थनाएँ की गईं। नवजीवन ने यंग इंडिया का संपादन संभाला। 190 में, भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के माध्यम से, एक पूर्ण असहयोग आंदोलन शुरू किया गया था। उसी वर्ष, गुजरात विश्वविद्यालय को एक असहयोग कार्यक्रम के भाग के रूप में स्थापित किया गया था। उन्हें 19 वीं में अंग्रेजों द्वारा गिरफ्तार किया गया, देशद्रोह का आरोप लगाया गया, लेकिन 19 वें में रिहा कर दिया गया। 12-7 के दौरान, उन्होंने अस्पृश्यता और खादी पर रचनात्मक कार्य किया। बाद में, उन्होंने 'हरिजन', 'हरिजनसेवक' और 'हरिजनबंधु' समाचार पत्रों का संपादन भी किया। 18 में बारडोली ने सत्याग्रह का मार्गदर्शन किया। 190 में, पूर्ण स्वतंत्रता के वादे के साथ, उन्होंने नमक सत्याग्रह के लिए एक मार्च शुरू किया। वह 19 वें अहमदाबाद में आयोजित गुजराती साहित्य परिषद के बारहवें सत्र के अध्यक्ष थे। 19 में, उन्होंने अंग्रेजों से 'भारत छोड़ने' का आह्वान किया। अंततः 15 अगस्त 19 को भारत स्वतंत्र हो गया लेकिन उसकी इच्छा के विरुद्ध भारत विभाजित हो गया और सांप्रदायिक दंगे भड़क उठे। आखिरकार, दिल्ली में गोडसे नामक एक हिंदू महासभा द्वारा पूजा स्थल पर उनकी हत्या कर दी गई, जिसका मुसलमानों से मोहभंग हो गया था।



गांधीजी की राष्ट्रव्यापी चेतना ने न केवल गुजराती साहित्य बल्कि भारत की अन्य भाषाओं को भी प्रेरित किया। गांधीवादी साहित्य का जन्म उनके व्यक्तित्व और उनकी विचारधारा के प्रबल प्रभाव में कई भाषाओं में हुआ है। गुजराती साहित्य में, गांधी-प्रभावित साहित्यिक युग, जो पंडित युग के वजनदार साहित्यिक मूल्यों को दर्शाता है और सादगी और सरलता के सामान्य मूल्यों को प्रसारित करता है, को 'गांधी युग' नाम दिया गया है; साथ ही, गांधीचिंतन और गांधी शैली को सम्मानित किया गया है।


उनकी पुस्तक 'ट्रुथ एक्सपेरिमेंट्स या ऑटोबायोग्राफी' (19) न केवल गुजराती साहित्य बल्कि विश्व साहित्य के लिए भी महत्वपूर्ण योगदान है। आत्मकथा, जो 302 पृष्ठों में फैली हुई है और दो भागों में विभाजित है, 18 से 160 के बीच बाल विवाह से लेकर नागपुर सत्याग्रह तक, लेखक के जीवन, बचपन की घटनाओं को शामिल करती है। विचार और आचरण को एकजुट करने के संघर्ष की कहानी इस कथा के भीतर बहती है, जो निडर प्रस्तुति, निर्भीक स्वीकारोक्ति और निर्मम आत्मनिरीक्षण का मॉडल है। सच्चाई के साथ सच्चाई को आगे बढ़ाने का रोमांच इस तरह मुश्किल है, जैसा कि लेखक ने कई बार यहां दिखाया है। यह देखा जा सकता है कि संयम और विवेक स्वतः ही उन अवसरों के विवरण में बनाए रहते हैं जो उनके अच्छे या संकीर्ण पक्षों को प्रस्तुत करते हैं। यहाँ पर अनियंत्रित भाषा का अप्रत्यक्ष व्यापार अपनी सादगी के आकर्षण से समृद्ध है। संक्षेप में, एक निडर आत्म-साधक की यह कहानी दुनिया की आत्मकथाओं के बीच अद्वितीय है।

 

(दक्षिण अफ्रीका में सत्याग्रह का इतिहास ’(19) न केवल तथ्यों का एक साधारण रिकॉर्ड है, बल्कि अपने पात्रों, संवादों और टिप्पणियों के माध्यम से दक्षिण अफ्रीका में रहने के दौरान उनके द्वारा लिए गए मूल्यवान अनुभवों का एक दिलचस्प चित्रण भी है। उनका जीवन-आकार, सत्याग्रह-एम्बेडेड प्रयोग, रंगवाद के खिलाफ उनका संघर्ष, भूगोल वहाँ सब कुछ उसके लिए स्वादिष्ट के रूप में नीचे आ गया है। यहां एक तटस्थ खाता है कि उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के इतिहास को कैसे आकार दिया।

 

Has हिंद स्वराज ’(19) में उन्होंने हिंद स्वराज की अपनी अवधारणा प्रस्तुत की है; और इसके सभी पहलुओं पर विचार किया है। इसमें एक देशभक्त नायक द्वारा दी गई तस्वीर है, जिसे स्वराज को विदेशी शासन द्वारा देश को मुक्त कराकर लाया जा सकता है। लेखक का क्रांतिकारी दर्शन यहाँ एक मजबूत शैली में प्रकट होता है। पुस्तक को पाठक और लेखक के बीच एक शानदार संवाद के रूप में लिखा गया है।

 

'मंगल प्रभात' (120) में यरवदा जेल से आश्रमवासियों के लिए मन्नत पर उनकी टिप्पणी का संग्रह है। प्रत्येक मंगलवार की प्रार्थना और मंगलभवन के लिए लिखे गए, इन लेखन का एक सरल आदर्श वाक्य है। यह आध्यात्मिक और नैतिक जीवन के कुछ सिद्धांतों की व्याख्या करता है।

 

19 में अधूरा रह गया 'सत्याग्रह का इतिहास' 19 में प्रकाशित हुआ है। यह इतिहास खंडित और अधूरा है। यह संगठन के विकास को चार्ट करने का एक प्रयास है; साथ ही, महत्वपूर्ण सिद्धांतों जैसे सत्य, प्रार्थना, अहिंसा, ब्रह्मचर्य, गैर-आक्रामकता, शारीरिक श्रम, स्वदेशी, अस्पृश्यता, कृषि, गोसेवा, शिक्षा, सत्याग्रह, आदि के मूल्यांकन का प्रयास है।

इसके अलावा, from माई प्रिज़न एक्सपीरियंस ’(191), aya सर्वोदय’ (19), er यरवदा का एक्सपीरियंस ’(19), ash नितिनाशने मरगे’ (19), ab गीताबोध ’(150), as अनासक्तयोग’ (150), Health हेल्थ ’ की (18), 'गोसेवा' (15), 'वर्णव्यावस्था' (19), 'धर्ममंथन' (17), 'व्यपाक धर्मभवन' (15), 'खल केलवानी' (16), 'केल्विनो नो कोइडो' (17) , 'त्यागमूर्ति और अन्य लेख' (च। 19) आदि में उनकी कई पुस्तकें हैं।

 

उनके लेखन, भाषण, पत्र आदि को 1 से 20 तक are गांधीजी की अक्षरदे ’पुस्तक में संग्रहित करने का प्रयास किया जा रहा है। इस अवधि में 19 से अब तक 6 ग्रंथ आ चुके हैं। इस ग्रंथ सूची में उनकी सोच का बड़ा परिचय है। उनके कई लेखन मरणोपरांत प्रकाशित हुए हैं, जैसे 'बेसिक एजुकेशन' (190), 'संयम और सनातनी' (19), 'सर्वोदयदर्शन' (18)।

संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 15 जून, 2007 को घोषणा की कि प्रत्येक वर्ष 2 अक्टूबर को अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस मनाया जाएगा।



गांधी शांति पुरस्कार

महात्मा गांधी के नाम पर अंतर्राष्ट्रीय गांधी शांति पुरस्कार भारत सरकार द्वारा प्रतिवर्ष प्रदान किया जाता है। इसकी शुरुआत 19 वीं वर्षगांठ की 14 वीं वर्षगांठ के अवसर पर गांधीजी द्वारा प्रदान किए गए आदर्शों के प्रति श्रद्धांजलि के रूप में की गई थी। यह अहिंसा और अन्य गांधीवादी तरीकों के माध्यम से सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक परिवर्तन में उनके योगदान के लिए व्यक्तियों और संगठनों को दिया जाने वाला एक वार्षिक पुरस्कार है। पुरस्कार रु। नकद में 1 करोड़, एक पट्टिका और एक प्रशंसापत्र। यह राष्ट्रीयता, नस्ल, लिंग या जातीयता की परवाह किए बिना सभी के लिए खुला है।


क्या आप जानते हैं कि महात्मा गांधी को महात्मा की उपाधि रवीन्द्र नाथ टैगोर ने दी थी और रवीन्द्र नाथ टैगोर को गुरुदेव की उपाधि गांधी जी ने दी थी.

राष्ट्रीय और त्यौाहार अवकाश अधिनियम 1963 के अनुसार प्रत्येक कैलेंडर वर्ष में हर कर्मचारी को 26 जनवरी, 15 अगस्त, 2 अक्टूबर, 1 मई और पांच अन्य अवकाशों पर एक पूरे दिन की छुट्टी देने का प्रावधान है.

इतना ही नहीं उनका जन्मदिन अंतर्राष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रूप में भी मनाया जाता है. 15 जून, 2007 को संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा 2 अक्टूबर को अंतरराष्ट्रीय अहिंसा दिवस के रुप में घोषित किया.

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी महात्मा गांधी के अनुयायी है. उन्होंने भारत के इतिहास में पहली बार लोगो से अनुरोध किया कि इस दिवस को भारतवासी  सिर्फ छुट्टियों के दिवस के रूप में ही न मनाएं बल्कि “स्वच्छ अभियान” कार्यक्रम की शपथ लें और भारत को स्वच्छ रखने में मदद करें.

महात्मा गांधी की समाधि पर राष्ट्रपति और भारत के प्रधानमंत्री की उपस्थिति में प्रार्थना आयोजित की जाती है, जहां उनका अंतिम संस्कार किया गया था.

गांधी जी का सिविल राइट्स आंदोलन (Civil Rights Movement) कुल 4 महाद्वीपों और 12 देशों तक पहुंचा था.

- गांधी जी ने साउथ अफ्रीका के डर्बन, प्रिटोरिया और जोहांसबर्ग में तीन फुटबॉल क्लब स्थापित करने में मदद की थी. इन तीनों क्लब का नाम एक ही था - "पैसिव रेसिस्टर्स सॉकर क्लब".

वर्ष 1931 में इंग्लैंड यात्रा के दौरान गांधी जी ने पहली बार रेडियो पर अमेरिका के लिए भाषण दिया था. रेडियो पर उनके पहले शब्द थे “क्या मुझे इसके अंदर (माइक्रोफोन) बोलना पड़ेगा?” “Do I have to speak into this thing?”

क्या आप जानते हैं कि वर्ष 1930 में उन्हें अमेरिका की प्रतिष्ठित टाइम मैगजीन ने “वर्ष का सबसे महत्वपूर्ण व्यक्ति” का पुरुस्कार दिया था.

- महात्मा गांधी को “राष्ट्रपिता” (Rashtrapita) की उपाधि सुभाष चन्द्र बोस ने दी थी.

- 30 जनवरी, 1948 को नाथूराम गौड़से नामक व्यक्ति ने गांधी जी को गोली मारकर हत्या कर दी थी.

- महात्मा गांधी की शवयात्रा 8 किलोमीटर लंबी थी.

- गांधी जी ने अपनी आत्मकथा "द स्टोरी ऑफ़ माय एक्सपेरिमेंट्स विथ ट्रुथ" (The Story of My Experiments with Truth) में दर्शन और अपने जीवन के मार्ग का वर्णन किया है.


अधिक जानकारी के लिए नीचे दी गई फ़ाइल पढ़ें।