મહિનામા આવતા મહત્વના દિવસોની યાદી

સુવિચાર

"જો તમારી અંદર પ્રતિભા હોય તો તમે જરૂર સફળ થશો પછી ભલે પરિસ્થિતીઓ કેટલી પણ વિપરીત કેમ ન હોય તે તમને સફળતાની ઉડાન ભરવાથી ક્યારેય રોકી શકશે નહી"

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26 March, 2023

महादेवी वर्मा

 महादेवी वर्मा

(आधुनिक युग की मीरा, हिंदी भाषा की एक अच्छी कवयित्री)



जन्म तिथि: 26 मार्च 1907

जन्म स्थान: उत्तर प्रदेश

पिता का नाम : गोविंदप्रसाद वर्मा

माता का नाम : हेमरा की देवी

निधन: 11 सितंबर 1987

आधुनिक युग की मीरा’ कही जाने वाली महादेवी वर्मा का जन्म उत्तर प्रदेश के फ़र्रुख़ाबाद में होली के दिन  26 मार्च 1907 में हुआ था। उनकी आरंभिक शिक्षा उज्जैन में हुई और एम. ए. उन्होंने संस्कृत में प्रयाग विश्वविद्यालय से किया। बचपन से ही चित्रकला, संगीतकला और काव्यकला की ओर उन्मुख महादेवी विद्यार्थी जीवन से ही काव्य प्रतिष्ठा पाने लगी थीं। वह बाद के वर्षों में लंबे समय तक प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्राचार्या रहीं। वह इलाहाबाद से प्रकाशित ‘चाँद’ मासिक पत्रिका की संपादिका थीं और प्रयाग में ‘साहित्यकार संसद’ नामक संस्था की स्थापना की थी।  

‘निराला वैशिष्ट्य’ की स्वामिनी महादेवी वर्मा छायावाद की चौथी स्तंभ भी कही जाती हैं। प्रणय एवं वेदनानुभूति, जड़ चेतन का एकात्म्य भाव, सौंदर्यानुभूति, मूल्य चेतना, रहस्यात्मकता उनकी मुख्य काव्य-वस्तु है। वह प्रधानतः गीति कवयित्री हैं जिनके काव्य में परंपरा और मौलिकता का अद्वितीय समन्वय नज़र आता है। शब्द-निरूपण, वर्ण-विन्यास, नाद-सौंदर्य और उक्ति-सौंदर्य-सभी दृष्टियों से वह भाषा पर सहज अधिकार रखती हैं। उन्होंने अपने काव्य में प्रतीकात्मक संकेत-भाषा का प्रयोग किया है जिसमें छायावादी प्रतीकों के साथ ही मौलिक प्रतीकों का भी कुशल प्रयोग हुआ है। उनका वर्ण-परिज्ञान उनके बिंब-विधान की प्रमुख विशेषता है। चाक्षुष, श्रव्य, स्पर्शिक बिंबों में उनकी विशेष रुचि रही है। अप्रस्तुत के माध्यम से प्रस्तुत के साम्य गुणों का चित्रण वह बख़ूबी करती हैं। रूपक, अन्योक्ति, समासोक्ति तथा उपमा उनके प्रिय अलंकार हैं। उनके संबंध में कहा गया है कि छायावाद ने उन्हें जन्म दिया था और उन्होंने छायावाद को जीवन दिया। 

उन्होंने कविताओं के साथ ही रेखाचित्र, संस्मरण, निबंध, डायरी आदि गद्य विधाओं में भी योगदान किया है। ‘नीहार’, ‘रश्मि’, ‘नीरजा’, ‘सांध्य गीत’, ‘यामा’, ‘दीपशिखा’, ‘साधिनी’, ‘प्रथम आयाम’, ‘सप्तपर्णा’, ‘अग्निरेखा’ उनके काव्य-संग्रह हैं। रेखाचित्रों का संकलन ‘अतीत के चलचित्र’ और ‘स्मृति की रेखाएँ’ में किया गया है। ‘शृंखला की कड़ियाँ’, ‘विवेचनात्मक गद्य’, ‘साहित्यकार की आस्था तथा अन्य निबंध’, ‘संकल्पिता’, ‘हिमालय’, ‘क्षणदा’ उनके निबंधों का संकलन है। 

वह साहित्य अकादेमी की सदस्यता प्राप्त करने वाली पहली लेखिका थीं। भारत सरकार ने उन्हें पद्म भूषण और पद्म विभूषण पुरस्कारों से सम्मानित किया। उन्हें यामा के लिए ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। भारत सरकार ने उनके सम्मान में जयशंकर प्रसाद के साथ युगल डाक टिकट भी जारी किया।  


सुमित्रानंदन पंत, जयशंकर प्रसाद, सूर्यकांत त्रिपाठी और महादेवी वर्मा हिन्दी साहित्य के छायावादी युग के चार प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं।


आधुनिक हिंदी की सबसे शक्तिशाली कवियों में से एक होने के कारण उन्हें आधुनिक मीरा के नाम से भी जाना जाता है। कवि निराला ने उन्हें "हिंदी के विशाल मंदिर की सरस्वती" भी कहा है।

उन्होंने खड़ी बोली हिंदी कविता में एक नरम शब्दावली विकसित की जो आज तक केवल व्रज भाषा में ही संभव मानी जाती है। उसके लिए उन्होंने अपने समय के अनुकूल संस्कृत और बांग्ला के कोमल शब्दों को चुनकर उन्हें हिंदी का रूप दिया। संगीत के पारखी होने के कारण उनके गीतों का मधुर सौन्दर्य और उनके काव्य-वाक्यों की व्यंजन शैली अन्यत्र दुर्लभ है। उन्होंने अध्यापन से अपना करियर शुरू किया और अंत तक वे प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाध्यापिका बनीं। उनका बाल विवाह हुआ था लेकिन उन्होंने अपना जीवन कुंवारे के रूप में बिताया। प्रख्यात कवयित्री और गद्य लेखिका महादेवी वर्मा साहित्य और संगीत की विदुषी होने के साथ-साथ कुशल चित्रकार और सृजनात्मक अनुवादक भी थीं।


उन्होंने अपने जीवन की शुरुआत एक शिक्षिका के रूप में की और अंत तक प्रयाग महिला विद्यापीठ की प्रधानाचार्य बनीं। बाल विवाह किया लेकिन ब्रह्मचारी जीवन व्यतीत किया। उन्होंने गद्य में भी लिखा। वे संगीत और चित्रकला में भी निपुण थे। उन्होंने नौहार, रश्मी, नीरजा, संध्या गीत, दीपशिखा, यम, सप्तपूर्णा, अतीत के चलचित्र केकम स्मृति की रेखा, स्मृति, दृष्टि बोध, नीलांबर, आत्मिका, विवेचनात्मक गद्य, खंड जैसी पुस्तकें लिखी हैं। नैनीताल से 25 किमी. उन्होंने दूर रामगढ़ के उमागढ़ में एक बंगला बनवाया, जिसे आज महादेवी साहित्य संगमालय के नाम से जाना जाता है। वहीं रहते हुए उन्होंने महिला जागरूकता, महिला शिक्षा और नशामुक्ति के लिए काम किया। हिंदी साहित्य में अद्वितीय योगदान के बाद 1987 में महादेवी वर्मा का इलाहाबाद में निधन हो गया।


गांधी का उन पर बहुत प्रभाव था। यह गांधी ही थे जिन्होंने उन्हें महिला शिक्षा के लिए काम करने के लिए प्रेरित किया। गांधी को केवल हिंदी में बोलते देख महादेवी ने पूछा क्यों, बापू ने कहा कि केवल हिंदी भाषा ही भारत की आत्मा को आसानी से व्यक्त कर सकती है। तभी से महादेवी ने हिंदी को अपने जीवन का आधार बनाया।

महादेवी वर्मा की प्रमुख रचनाएं

महादेवी वर्मा के आठ कविता संग्रह है जिनमे निहार 1930 में, रश्मि 1932 में, सांध्यगीत 1936 में, दीपशिखा 1942 में सप्तपर्णा को अनूदित है 1959 में प्रथम आयाम 1974 मेंं अग्निरेखा 1990 में प्रकाशित हुए।

देवी वर्मा जी के 10 से ज्यादा काव्य संकलन प्रकाशित हुए जिनमें से निम्न है। आत्मिका, निरन्तरा, परिक्रमा, सन्धिनी 1965 में यामा 1936 में गीतपर्व, दीपगीत, स्मारिका और हिमालय उल्लेखनीय है।

महादेवी वर्मा के प्रमुख रेखा चित्रों में अतीत के चलचित्र 1941 में और स्मृति की रेखाएं 1943 में श्रृंखला की कड़ियां और मेरा परिवार उल्लेखनीय है।

महादेवी वर्मा ने 1956 में पद का साथी और 1972 में मेरा परिवार स्मृति चित्रण 1973 में और संस्मरण 1983 में उल्लेखनीय संस्मरण लिखे।

महादेवी वर्मा के प्रमुख निबंध संग्रह में श्रृंखला की कड़ियां 1942 में प्रकाशित हुई और विवेचनात्मक गद 1942 साहित्यकार की आस्था और अन्य निबंध 1962 संकल्प ता 1969 और भारतीय संस्कृति के स्वर उल्लेखनीय है। क्षणदा महादेवी वर्मा का एकमात्र ललित निबंध ग्रंथ है।  प्रमुख कहानी संग्रह में गिल्लू प्रमुख है। संभाषण नामक भाषण संग्रह 1974 में प्रकाशित हुआ।

प्रमुख कविता संग्रह में ठाकुरजी भोले हैं और आज खरीदेंगे हम ज्वाला प्रमुख है।

महादेवी वर्मा की कविताएं –

  • निहार (1930)
  • रश्मी (1932)
  • नीरजा (1933)
  • संध्यागीत (1935)
  • प्रथम आयाम (1949)
  • सप्तपर्ण (1959)
  • दीपशिक्षा (1942)
  • अग्नि रेखा (1988)
महादेवी वर्मा की कहानियाँ
 
  • अतीत के चलचित्र
  • पथ के साथी
  • मेरा परिवार
  • संस्मरण
  • संभाषण
  • स्मृति के रेहाये
  • विवेचमानक गद्य
  • स्कंध
  • हिमालय


महादेवी वर्मा को मिली प्रमुख पुरस्कार और सम्मान

  • महादेवी जी को 1934 में नीरजा के लिए सक्सेरिया पुरस्कार दिया गया।
  • 1942 में स्मृति की रेखाएं के लिए द्विवेदी पदक दिया गया।
  • महादेवी वर्मा को 1943 में मंगलाप्रसाद पारितोषिक भारत भारती के लिए मिला।

  • महादेवी वर्मा को 1952 में उत्तर प्रदेश विधान परिषद के लिए मनोनीत भी किया गया।

  • 1956 में भारत सरकार ने साहित्य की सेवा के लिए इन्हें पद्म भूषण भी दिया।
  • 1982 में यामा के लिए महादेवी वर्मा को ज्ञानपीठ पुरस्कार दिया गया।
  • महादेवी वर्मा को मरणोपरांत 1988 में पद्म विभूषण पुरस्कार दिया गया।

  • महादेवी वर्मा को 1969 में विक्रम विश्वविद्यालय, 
  • 1977 में कुमाऊं विश्वविद्यालय, नैनीताल, 
  • 1980 में दिल्ली विश्वविद्यालय तथा
  •  1984 में बनारस हिंदू विश्वविद्यालय, वाराणसी ने इनको डी.लिट (डॉक्टर ऑफ लेटर्स) की उपाधि दी।

1979: साहित्य अकादमी फेलोशिप।

28 अप्रैल 2018: महादेवी वर्मा को भारत के गूगल डूडल पर चित्रित किया गया


महादेवी वर्मा के बारे में रोचक तथ्य

  • इनका बाल विवाह किया गया लेकिन इन्होंने अपना जीवन अविवाहित की तरह ही गुजारा।

  • महादेवी वर्मा की रुचि, साहित्य के साथ साथ संगीत में भी थी। चित्रकारिता में भी इन्होंने अपना हाथ आजमाया।

  • महादेवी वर्मा का पशु प्रेम किसी से छुपा नहीं है वह गाय को अत्यधिक प्रेम करती थी।

  • महादेवी वर्मा के पिताजी मांसाहारी थे और उनकी माताजी शुद्ध शाकाहारी थी।

  • महादेवी वर्मा कक्षा आठवीं में पूरी प्रांत में प्रथम स्थान पर रही।

  • महादेवी वर्मा इलाहाबाद महिला विद्यापीठ की कुलपति और प्रधानाचार्य भी रही।

  • यह भारतीय साहित्य अकादमी की सदस्यता ग्रहण करने वाली पहली महिला थी जिन्होंने 1971 में सदस्यता ग्रहण की।


"मेरी आहे सोती है ऑटो की सौतो में, मेरा सर्वस्व छुपा है इन दीवानी चौतो में" -


महादेवी वर्मा की मृत्यु 11 सितंबर 1987 को इलाहाबाद (प्रयागराज), उत्तर प्रदेश में हुई थी। मृत्यु के समय उनकी उम्र 80 वर्ष थी। उन्होंने अपने जीवन में गुलाम भारत व आजाद भारत दोनों को देखा था।

वह छायावादी आंदोलन की एक महान कवयित्री थी जिन्होंने अनेकों विषयों पर कहानियां, कविताएं, उपन्यास आदि लिखे।

20 July, 2022

ઉમાશંકર જોશી

 ઉમાશંકર જોશી


જન્મતારીખ:  21 જુલાઇ 1911

જન્મસ્થળ: બામણા, સાબરકાંંઠા, ગુજરાત

પિતાનું નામ: જેઠાલાલ કમળજી જોશી

માતાનું નામ: નવલબેન

અવશાન: 19 ડિસેમ્બર 1988

ઉપનામ: વાસુકી, શ્રવણ


ગુજરાતી સાહિત્યમાં ' વાસુકિ ' અને  '  શ્રવણ ' ઉપનામધારી ઉમાશંકર જોશીનો જન્મ ઉત્તર ગુજરાતમાં આવેલા સાબરકાંઠા જિલ્લાના , ઇડર તાલુકાના બામણ ગામમાં 21 , 1911 ( સવંત 1967ના આષાઢ વદ -10 ) ના રોજ ત્રિવેદી મેવાડા બ્રાહ્મણ કુટુંબમાં થયો હતો. તેમનું આ જ્ન્મસ્થળ ' નાની મારવાડ' તરીકે  પણ અળખાતું. ઉમાશંકર જોશીના પિતાનું મૂળ વતન લૂસડીયા ગામ કે જે બમણાથી લગભગ વીસ કિલોમીટર દુર અરવલ્લી પહાડોના વિશાળ વિસ્તારમાં આવેલું છે.

તેઓ ગુજરાતી કવિતાના પ્રથમ પંક્તિના ચિરંજીવ કવિ અને વિદ્વાન સાહિત્યકાર હતા. સમકાલીન સાહિત્યકરોમાં અનેક રીતે નોખા તરી આવતા ઉમાશંકર જોશી પ્રજ્ઞાવાન અને પ્રતિભાવાન વ્યક્તિત્વ ધરાવતા હતા. ઉમાશંકર જોશીની સંવેદના વિશ્વમાન સુધી વ્યાપેલી હતી. તેમને ચિંતન અને સર્જનમાં મહાત્મા ગાંધી, રવીન્દ્રનાથ ટાગોર અને ભારતીય સંસ્કૃતિની અસર જોવા મળે છે. ' હું ગુર્જર ભારતવાસી' ' એ ઉક્તિ જેમને  યથાર્થ લાગુ પડે છે એવા આ કવિ વિશે શ્રી  વિષ્ણુપ્રસાદ ર.  ત્રિવેદીએ  નોંધ્યું છે કે ," શ્રી ઉમાશંકર જોશી, આપણો નવીન પણ અગ્રણી કવિ , સાહિત્યના અનેક પ્રાંત સર કરનાર સાહિત્યકાર , ગુજરાતી સુક્ષ્મ સંપત્તિ છે. તેમની કૃતિઓનો ઉલ્લેખ બીજા પ્રાંતોમાં પણ એમના જેવા સાહિત્યકાર ગણતર જ હશે." આમ, આ પથમ પ્રકરણમાં મારો પ્રયત્નો ઉમાશંકર જોશીના જીવન અને કવનને ઉંડાણપૂર્વક સમજવાનો છે.

તેઓનું પ્રાથમિક શિક્ષણ બામણામાં અને માધ્યમિક શિક્ષણ ઇડરમાં થયું હતું. ૧૯૨૮માં અમદાવાદમાં ગુજરાત કોલેજથી મેટ્રિક કર્યું. તેઓ ૧૯૩૬માં અમદાવાદમાં ઇતિહાસ અને અર્થશાસ્ત્રના વિષય સાથે બી.એ. થયા અને ૧૯૩૮માં સંસ્કૃત અને ગુજરાતી વિષયો સાથે મુંબઈની એલ્ફિસ્ટન કોલેજમાંથી એમ.એ. ઉત્તીર્ણ કર્યું. એમ.એ.માં તેઓ પ્રથમ વર્ગમાં ઉત્તીર્ણ થયા

◆ કવિતા :-

(1)  વિશ્વશાંતિ             ( 1931)

(2) ગંગોત્રી                  (1934)

(3) નિશિય                  ( 1939)

(4) પ્રાચીના                 ( 1944)

(5) આતિથિયો             (1946)

(6) વસંતવર્ષા               ( 1954)

(7) મહાપ્રસ્થાન            ( 1965)

(8) અભિજ્ઞા                ( 1967)

(9)  ભોમિયા  વિના       (1993)

(10 ધારાવસ્ત્રો            (1981)

(11) સપ્તદી               ( 1981)

(12) સમગ્ર કવિતા      ( 1981)

◆ નાટક:- 
                (1) સાપના ભારા (1937)
                
               (2)હવેલી 1977, ' શહીદ'


■  ટૂંકી વાર્તા :- 

               (1)  શ્રાવણી મેળો (1937),

               (2)  વિસામો 1959'  ત્રણ અધું બે  અને બીજી વાતો'( 1938) 

                     તથા '  અંતરાય ' (1947) ની  વાર્તાઓમાં
                      
                (૩) ઉમાશંકર જોશીની શ્રેષ્ઠ વાર્તાઓ  (1985)

◆  નવલકથા :-  
      
               (1)  પારકા જાન્યાં          (1940)

◆  નિબંધ :-

             (1)  ગોષ્ઠી                   (1951)           
            (2) ઉઘાડી બારી             ( 1959)            
             (3)  શિવ સંકલ્પ            (1978)              

મુખ્ય રચનાઓ

  • મુખ્ય કૃતિ - નિશીથ (મધ્ય રાત્રિનો દેવતા)
  • કવિતા- વિશ્વશાંતિ, ગંગોત્રી, નિશીથ, મહાપ્રસ્થાન, અભિજ્ઞા , સાતપદ, ધારાવસ્ત્ર, સમગ્ર કવિતા
  • પદ્ય નાટકો - પ્રાચીના, મહાપ્રસ્થાન
  • એકાંકી- સાપના ભારા, હવેલી , શહીદ
  • વાર્તાસંગ્રહો- શ્રાવણી મેળો, વિસામો , ત્રણ અર્ધું બે
  • નિબંધ સંગ્રહ – ઉઘાડી બારી , ગોષ્ઠિ
  • સંશોધન – પુરાણોમાં ગુજરાત , 'અખો' એક અધ્યયન ;
  • વિવેચન – કવિની શ્રદ્ધા , અભિરુચિ
  • અનુવાદ – શાકુંતલ, ઉત્તર રામચરિત
  • ચિંતન - ઇશાવાસ્યોપનિષદ
  • પ્રવાસ - યુરોપયાત્રા (અંગ્રેજી)
  • બાળગીત - સો વરસનો થા
  • સંપાદન - કલાન્ત કવિ (કવિ બલાશંકરનાં કાવ્યો)
  • તંત્રી - 'સંસ્કૃતિ' ૧૯૪૭-૧૯૮૪, બુદ્ધિપ્રકાશ

તેમને મળેલ પુરસ્કારો
  • જ્ઞાનપીઠ પુરસ્કાર - ૧૯૬૭ (નિશીથ માટે)
  • રણજિતરામ સુવર્ણચંદ્રક - ૧૯૩૯ (ગંગોત્રી માટે)
  • નર્મદ સુવર્ણ ચંદ્રક - ૧૯૪૭ (પ્રાચીના માટે)
  • ઉમા-સ્નેહરશ્મિ પારિતોષિક - ૧૯૬૩ (મહા પ્રસ્થાન માટે)
  • સોવિએત લેન્ડ નહેરૂ એવોર્ડ - ૧૯૭૩
  • મહિડા પારિતોષિક - 1944 (પ્રાચિના માટે)
  • કવિ ન્હાલાલ પારિતોષિક - 1968 ((અભિજ્ઞા માટે)

વિવિધ સંસ્થાઓઅના રહેલ સભ્ય
  • સભ્ય - નેશનલ બુક ટ્રસ્ટ - ૧૯૬૫
  • સભ્ય - કેન્દ્રીય ભાષા સલાહકર સમિતિ - ૧૯૬૬
  • પ્રમુખ - ગુજરાતી સાહિત્ય પરિષદ - ૧૯૬૮
  • પ્રમુખ - સાહિત્ય અકાદમી એવોર્ડ-ગુજરાતી - ૧૯૭૮-૧૯૮૨
  • કુલપતિ - ગુજરાત યુનિવર્સિટી - ૧૯૭૦
  • રાજ્યસભાના સભ્ય - ૧૯૭૦-૧૯૭૬
  • કુલપતિ, વિશ્વભારતી યુનિવર્સિટી - શાંતિનિકેતન - ૧૯૭૯-૧૯૮૨
  • પ્રમુખ - દિલ્હી સાહિત્ય અકાદમી - ૧૯૭૮-૧૯૮૩


તેમના નામે હિમતનગરમાં ઓવર બ્રિજ આવેલ છે.

તેમની પ્રખ્યાત પંક્તિઓ અને કાવ્યો

ભોમિયા વિના મારે ભમવા તા ડુંગળા....

વિશાળ જગ વિસ્તારે નથી એક જ માનવી, 
પશુ છે, પંખી છે,પુષ્પો વનોની છે વનસ્પતિ,..

ત્રણ વાના મુજને મળ્યા, હૈયુ, મસ્તક ને હાથ
બહુ આપી દિધુ નાથ, જા હવે ચોથુ નથી માંગવું.

ધન્ય ભૂમિ ગુજરાત ધન્ય હે ધન્ય ગિરા ગુજરાતી
કૃષ્ણ ચરણ રજ પુનિત ધર, આ ગાંધીગીરા ગુજરાતી

વ્યક્તિ મટીને બનુ વિશ્વ માનવી...






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19 October, 2021

મહર્ષી વાલ્મીકી જયંતિ

 મહર્ષી વાલ્મીકી જયંતિ





દર વર્ષે વિક્રમ સવંત મુજબ આસો સુદ પૂનમના દિવસે મહર્ષી વાલ્મીકી જયંતિ ઉજવવામાં આવે છે.

વાલ્મીકીને સંસ્કૃત સાહિત્યના પહેલા મહાકવિ કહેવાય છે. તેમણે સંસ્કૃતમાં પહેલા મહાકાવ્યની રચના કરી હતી. જેને આખી દુનિયા 'રામાયણ'ના નામે ઓળખે છે. વાલ્મીકીને મહર્ષિ વાલ્મીકી પણ કહેવામા આવે છે અને તે આદિ કવિના રૂપે પ્રસિદ્ધ છે. પ્રથમ સંસ્કૃત મહાકાવ્યની રચના કરવાને કારણે વાલ્મીકી 'આદિ કવિ' કહેવાયા. મહર્ષિ વાલ્મીકીને ભગવાન શ્રી રામના સમકાલીન ગણવામાં આવે છે.

તેમના જન્મનો સાચો સમય કોઈ જાણતુ નથી અને આધુનિક ઈતિહાસકારોની વચ્ચે તે ચર્ચાનો વિષય પણ છે. વાલ્મીકીનો ઉલ્લેખ સતયુગ, ત્રેતા અને દ્વાપર, ત્રણે કાળોમાં મળે છે. જો કે હિંદુ ચંદ્ર કેલેન્ડર પ્રમાણે અશ્વિન પૂર્ણિમાંના દિવસે તેમની જન્મજયંતી ઉજવવામાં આવે છે



 મહર્ષિ વાલ્મીકિ અથવા પ્રાચેતસ એક બ્રાહ્મણને ત્યાં જન્મ્યા હતા; પણ તેનાં માતાપિતા જે તપ કરવા જંગલમાં ગયાં હતાં તેમણે તેને જંગલમાં મૂકી દીધા. પછીથી કોઈ ભીલની દ્રષ્ટિએ તે પડ્યા. તેણે તેને ઉછેર્યો. તે મોટા થયા એટલે તેને ધનુર્વિદ્યામાં નિપુણ બનાવી ભીલ તેની પાસે ચોરીનું કામ કરાવવા લાગ્યો, 

.મહર્ષિ વાલ્મીકી પોતાના જીવનની શરૂઆતમાં એક રત્નાકર નામના લુંટારા હતા. તેઓ સૌ પહેલા લોકોને મારી નાખતા હતા અને ત્યાર બાદ તેમને લુટી લેતા હતા. 

એક વખત તે અરણ્યમાં લૂંટને માટે ફરતા હતા ત્યાં એક મહર્ષિને જોઈને તેની પાસે જે હોય તે માગ્યું. ઋષિએ તેને કહ્યું કે, જેને માટે તું પાપ કરે છે તે તારાં સગાંઓને પૂછી આવ કે, તેઓ તારા પાપમાં ભાગીદાર થશે? કુટુંબીઓને પૂછતાં તેઓએ ના કહી. આથી તેને બહુ ખોટું લાગ્યું અને ઋષિને શરણે ગયા. તેથી તે મહર્ષિ તેને રામનામનો જપ કરવાનું કહી અંતર્ધાન પામ્યા.

ઋષિ નારદ મુનિએ લુટારા રત્નાકરને ભગવાન રામના મહાન ભક્ત બનવામાં મદદ કરી હતી. 

નારદ મુનિ એ આપેલ સલાહ પ્રમાણે રત્નાકરે રામ નામના મહાન મંત્રનો જાપ કરતા તપસ્યા કરી હતી. 

મહર્ષિ જતાં તે ત્યાં જ જપ કરતા કરતા એટલા કાળ પર્યંત બેઠા કે, તેના શરીર ઉપર ઉધઈના રાફડા થઈ ગયા. પછી એ જ ઋષિએ આવી તેને એ રાફડામાંથી કાઢયા. રાફડાને સંસ્કૃતમાં વલ્મીક કહે છે તે ઉપરથી તેનું વાલ્મીકિ એવું નામ પડયું. તે પછી તેની ગણના ઋષિમાં થવા લાગી.

 તેમના મનમાં ભગવાન રામ પ્રત્યે ભક્તિ જાગી અને તે લુટારુ માંથી મહર્ષિ બની ગયા.

તેઓ તમસા નદીને કાંઠે આશ્રમ કરી રહ્યા. 

તેમના શિષ્યોમાં ભારદ્વાજ ઋષિ મુખ્ય હતા. 

એક વખત તેઓ નદીએ સ્નાન કરવા ગયેલા. સ્નાન કરતાં કરતાં સામેના વૃક્ષ પર કૌંચ પક્ષીનાં જોડાં ઉપર તેમની નજર પડી. એ જોડાંમાંનો નર જે કામાસક્ત બન્યો હતો તેને એક શિકારીએ બાણ વડે વીંધી નાખ્યો. તેથી પાછળ રહેલા પક્ષીને અતિશય શોક થયો. આથી વાલ્મીકિ હૃદયમાં એટલી બધી દયા ઊપજી કે, તેમના મુખમાંથી અનુષ્ટુપ છંદોબદ્ધ વાણી નીકળી.

मा निषाद प्रतिष्ठां त्वमगमः शाश्वतीः समाः।
यत्क्रौंचमिथुनादेकम् अवधीः काममोहितम्॥

પાછળથી બ્રહ્મદેવની આજ્ઞા પ્રમાણે પરમેશ્વરના જે નામ વડે પોતે પાવન થયા હતા તેમના જ નામ ઉપર શતકોટિ કાવ્ય તેણે રચ્યું. આ પહેલાં કોઈ પણ નિયમિત કાવ્ય હતું જ નહિ. આ કાવ્ય પ્રથમ જ રચાયેલું અને કવિ પણ પહેલા જ હોઈ ને વાલ્મીકિ આદ્યકવિ કહેવાય છે.

સંસ્કૃતના આદિ કવિ વાલ્મીકિએ રામાવતારની સાઠ હજાર વર્ષ પહેલાં જ દિવ્યદ્રષ્ટિથી રામાયણની રચના કરી હતી.

 તેમણે રચેલો ગ્રંથ વાલ્મીકિ રામાયણ આજે પણ સુપ્રસિદ્ધ છે. તે કાવ્યના સુબોધથી લાખો મનુષ્ય સુબુદ્ધિ તથા સુનીતિ શીખ્યા છે અને હજુ પણ એ ગ્રંથનો લાભ લેવાય છે. 

આ કવિ જેવા સંસ્કૃત ભાષામાં નવ રસમય વર્ણન કરવામાં બીજા થોડા જ કવિ થયા હશે. આ મહર્ષિની પવિત્રતા રામચંદ્રજી પણ જાણતા હતા. 

વનવાસ દરમિયાન રામ ચિત્રકૂટ ઉપર વાલ્મીકિને આશ્રમે આવી ઘણા દિવસ રહ્યા હતા. વળી ધોબીના વચનથી રામે સીતાને વનમાં મોકલ્યાં ત્યારે વાલ્મીકિ પોતાના ગંગા કિનારા ઉપરના આશ્રમે સીતાને તેડી લાવ્યા હતા. આ ઋષિએ લવ અને કુશને વેદ, ધનુર્વિદ્યા વગેરે શાસ્ત્રનું શિક્ષણ આપ્યું હતું. રામચંદ્રજીનો વાલ્મીકિ ઉપર પૂર્ણ ભાવ હતો તેથી તેમણે તેમની સલાહ લઈ પ્રજાહિતનાં કાર્યો કરેલાં છે.

તેમનું રચેલું "વાલ્મીકી રામાયણ" અને આધ્યાત્મ રામાયણ એટલે કે "યોગ વશિષ્ઠ" સંસ્કૃત ભાષાના સૌથી પ્રાચીન ગ્રંથ માનવામાં આવે છ






03 August, 2021

मैथिलीशरण गुप्त

 

मैथिलीशरण गुप्त

(राष्ट्रकवि )


राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त  हिन्दी के प्रसिद्ध कवि थे

बाल कविताओं के प्रमुख कवि और खड़ी बोली को अपनी कविताओं का माध्यम बनाने वाले प्रमुख महत्वपूर्ण कवि मैथिलीशरण गुप्त थे

 मैथिलीशरण गुप्त का जन्म ३ अगस्त १८८६ में पिता  रामचरण गुप्त और माता काशीबाई की तीसरी संतान के रूप में उत्तर प्रदेश में झांसी के पास चिरगांव में हुआ। 

माता और पिता दोनों ही वैष्णव थे। 

गुप्तजी के पिता स्वयं एक अच्छे कवि थे। पिता के काव्यानुरागी स्वभाव का गुप्तजी के जीवन पर प्रभाव पड़ा और बाल्याकाल में ही उन्होंने एक कविता रच डाली। पिता ने प्रशन्न होकर उन्हें महान कवि बनने का आशीर्वाद दिया, जो आगे चलकर फलीभूत हुआ ।

विद्यालय में खेलकूद में अधिक ध्यान देने के कारण पढ़ाई अधूरी ही रह गयी। 

रामस्वरूप शास्त्री, दुर्गादत्त पंत, आदि ने उन्हें विद्यालय में पढ़ाया। घर में ही हिन्दीबंगलासंस्कृत साहित्य का अध्ययन किया। मुंशी अजमेरीजी ने उनका मार्गदर्शन किया। 

१२ वर्ष की अवस्था में ब्रजभाषा में कनकलता नाम से कविता रचना आरम्भ किया। 

आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी के सम्पर्क में आने के कारण गुप्त जी को अपने प्रतिभा के अनुरूप क्षेत्र प्राप्त हुआ और उनकी काव्य-चेतना का विस्तार हुआ। उनकी कवितायें खड़ी बोली में मासिक "सरस्वती" में प्रकाशित होना प्रारम्भ हो गई।

राष्ट्रकवि मैथिलीशरण गुप्त जी के गुरु का नाम आचार्य महावीरप्रसाद द्विवेदी था । आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी जी से इन्हें बहुत प्रेरणा मिली। इसलिए ये द्विवेदी जी को अपना गुरु मानते थे ।

हिन्दी साहित्य के इतिहास में वे खड़ी बोली के प्रथम महत्त्वपूर्ण कवि हैं।

 उन्हें साहित्य जगत में 'दद्दा' नाम से सम्बोधित किया जाता था।


 उनकी कृति भारत-भारती (1912) भारत के स्वतन्त्रता संग्राम के समय में काफी प्रभावशाली सिद्ध हुई थी और और इसी कारण महात्मा गांधी ने उन्हें 'राष्ट्रकवि' की पदवी भी दी थी।


उनकी जयन्ती ३ अगस्त को हर वर्ष 'कवि दिवस' के रूप में मनाया जाता है। सन १९५४ में भारत सरकार ने उन्हें पद्मभूषण से सम्मानित किया।


महावीर प्रसाद द्विवेदी जी की प्रेरणा से गुप्त जी ने खड़ी बोली को अपनी रचनाओं का माध्यम बनाया और अपनी कविता के द्वारा खड़ी बोली को एक काव्य-भाषा के रूप में निर्मित करने में अथक प्रयास किया। 


इस तरह ब्रजभाषा जैसी समृद्ध काव्य-भाषा को छोड़कर समय और संदर्भों के अनुकूल होने के कारण नये कवियों ने इसे ही अपनी काव्य-अभिव्यक्ति का माध्यम बनाया। हिन्दी कविता के इतिहास में यह गुप्तजी का सबसे बड़ा योगदान है। 


घासीराम व्यासजी उनके मित्र थे। पवित्रता, नैतिकता और परंपरागत मानवीय सम्बन्धों की रक्षा गुप्तजी के काव्य के प्रथम गुण हैं, जो 'पंचवटी' से लेकर 'जयद्रथ वध', 'यशोधरा' और 'साकेत' तक में प्रतिष्ठित एवं प्रतिफलित हुए हैं। 'साकेत' उनकी रचना का सर्वोच्च शिखर है।


रचनाएँ


  • अनूदित रचनाएँ— ‘वीरांगना‘, ‘मेघनाद-वध’, ‘वृत्त-संहार’, ‘स्वप्नवासदत्ता’, ‘प्लासी का युद्ध’, ‘विरहिणी’, ‘ब्रजांगना’ आदि इनकी अनूदित रचनाएँ हैं।
  • मौलिक रचनाएँ— ‘साकेत’, ‘भारत-भारती’, ‘यशोदरा’, ‘द्वापर’, ‘जयभारत’, ‘विष्णुप्रिया’ आदि आपकी मौलिक रचनाएँ हैं।
  • साकेतः- यह उत्कृष्ट महाकाव्य है, श्रीरामचरितमानस के पश्चात् हिन्दी में राम काव्य का दूसरा स्तम्भ यही महाकाव्य है।
  • भारत-भारतीः- इसमें देश के प्रति गर्व और गौरव की भावनाओं पर आधारित कविताएँ हैं। इसी रचना के कारण गुप्त जी राष्ट्रकवि के रूप में विख्यात् हैं।
  • यशोधराः- इसमें बुद्ध की पत्नी यशोधरा के चरित्र को उजागर किया गया है।
  • द्वापर, जयभारत, विष्णुप्रियाः- इसमें हिन्दू संस्कृति के प्रमुख पात्रों का चरित्र का पुनरावलोकन कर कवि ने अपनी पुनर्निर्माण कला को उत्कृष्ट रूप में प्रदर्शित किया है।

गुप्त जी की अन्य प्रमुख रचनाएँ इस प्रकार हैं—

‘रंग में भंग’, ‘जयद्रथ-वध’, ‘किसान’, ‘पंचवटी’, ‘हिन्दू-सैरिन्धी’, ‘सिद्धराज’, ‘नहुष’, ‘हिडिम्बा’, ‘त्रिपथमा’, ‘काबा और कर्बला’, ‘गुरुकुल’, ‘वैतालिक’, ‘मंगलघट’, ‘अजित’ आदि।
‘अनघ’, ‘तिलोत्तमा’, ‘चन्द्रहास’ नामक तीन छोटे-छोटे पद्यबन्ध रूपक भी गुप्त जी ने लिखे हैं। इस प्रकार गुप्त जी का साहित्य विशाल और विषय-क्षेत्र बहुत विस्तृत है।


गुप्तजी को उनके काव्य की सर्वोत्कृष्टता पर सम्मानित करते हुए आगरा विश्वविद्यालय साहित्य-वाचस्पति की मानद्-उपाधि से विभूषित किया।


गुप्तजी को हिन्दी साहित्य-सम्मेलन ने इनकी रचना ‘साकेत’ पर ‘मंगलाप्रसाद पारितोषिक पुरस्कार’ प्रदान किया।


 गुप्त जी को दो बार राज्य-सभा के सदस्य होने का सम्मान भी प्राप्त हुआ ।


राष्ट्र की आत्मा को वाणी देने के कारण मैथिलीशरण गुप्त जी को राष्ट्रकवि कहा जाता है। महात्मा गाँधी ने इनकी राष्ट्रीयता की भावना से ओत-प्रोत रचनाओं के आधार पर ही इन्हें राष्ट्रकवि की उपाधि से विभूषित किया था, हिन्दी काव्य को श्रृंगार रस की दलदल से निकालकर उसमें राष्ट्रीय भावनाओं की पुनीत गंगा को बहाने का श्रेय गुप्त जी को ही है। 


12 दिसम्बर, 1964 ई. को माँ भारती का यह महान साधक पंचतत्व में विलीन हो गया ।


नीलाम्बर परिधान हरित पट पर सुन्दर है, 

सूर्य - चन्द्र युग मुकुट मेखला रत्नाकर है।

 नदियां प्रेम-प्रवाह, फूल तारे मण्डन है,

 बन्दीजन खगवृन्द, शेष-फन सिंहासन है।

 करते अभिषेक पयोद है, बलिहारी इस वेष की,

 हे मातृभूमि, तू सत्य ही सगुण मूर्ति सर्वेश की ।।

31 July, 2021

मुंशी प्रेमचंद


मुंशी प्रेमचंद


प्रेमचंद आधुनिक हिन्दी कहानी के पितामह और उपन्यास सम्राट माने जाते हैं।

मुंशी प्रेमचंद (31 जुलाई 1880–8 अक्तूबर 1936) का जन्म वाराणसी से चार मील दूर लमही गाँव में हुआ था। 

 उनकी माता का नाम आनन्दी देवी था तथा पिता मुंशी अजायबराय लमही में डाकमुंशी थे। 

उनका असली नाम धनपत राय श्रीवास्तव था।

उनकी शिक्षा का आरंभ उर्दू, फारसी से हुआ और जीवनयापन का अध्यापन से पढ़ने का शौक उन्‍हें बचपन से ही लग गया। 

13 साल की उम्र में ही उन्‍होंने तिलिस्म-ए-होशरुबा पढ़ लिया और उन्होंने उर्दू के मशहूर रचनाकार रतननाथ 'शरसार', मिर्ज़ा हादी रुस्वा और मौलाना शरर के उपन्‍यासों से परिचय प्राप्‍त कर लिया ।

 १८९८ में मैट्रिक की परीक्षा उत्तीर्ण करने के बाद वे एक स्थानीय विद्यालय में शिक्षक नियुक्त हो गए। 

नौकरी के साथ ही उन्होंने पढ़ाई जारी रखी।

१९१० में उन्‍होंने अंग्रेजी, दर्शन, फारसी और इतिहास लेकर इंटर पास किया और १९१९ में बी.ए. पास करने के बाद शिक्षा विभाग के इंस्पेक्टर पद पर नियुक्त हुए।


सात वर्ष की अवस्था में उनकी माता तथा चौदह वर्ष की अवस्था में पिता का देहान्त हो जाने के कारण उनका प्रारंभिक जीवन संघर्षमय रहा। 

उनका पहला विवाह उन दिनों की परंपरा के अनुसार पंद्रह साल की उम्र में हुआ जो सफल नहीं रहा। 

वे आर्य समाज से प्रभावित रहे जो उस समय का बहुत बड़ा धार्मिक और सामाजिक आंदोलन था।

 उन्होंने विधवा-विवाह का समर्थन किया और १९०६ में दूसरा विवाह अपनी प्रगतिशील परंपरा के अनुरूप बाल-विधवा शिवरानी देवी से किया। 

उनकी तीन संताने हुईं- श्रीपत राय, अमृत राय और कमला देवी श्रीवास्तव। 

१९१० में उनकी रचना सोज़े-वतन (राष्ट्र का विलाप) के लिए हमीरपुर के जिला कलेक्टर ने तलब किया और उन पर जनता को भड़काने का आरोप लगाया। 

सोजे-वतन की सभी प्रतियाँ जब्त कर नष्ट कर दी गईं। 

कलेक्टर ने नवाबराय को हिदायत दी कि अब वे कुछ भी नहीं लिखेंगे, यदि लिखा तो जेल भेज दिया जाएगा। 

इस समय तक प्रेमचंद, धनपत राय नाम से लिखते थे। 

उर्दू में प्रकाशित होने वाली ज़माना पत्रिका के सम्पादक और उनके अजीज दोस्‍त मुंशी दयानारायण निगम ने उन्हें प्रेमचंद नाम से लिखने की सलाह दी।

 इसके बाद वे प्रेमचन्द के नाम से लिखने लगे। उन्‍होंने आरंभिक लेखन ज़माना पत्रिका में ही किया।

 जीवन के अंतिम दिनों में वे गंभीर रूप से बीमार पड़े। उनका उपन्यास मंगलसूत्र पूरा नहीं हो सका और लम्बी बीमारी के बाद ८ अक्टूबर १९३६ को उनका निधन हो गया। उनका अंतिम उपन्यास मंगल सूत्र उनके पुत्र अमृत ने पूरा किया।

यों तो उनके साहित्यिक जीवन का आरंभ १९०१ से हो चुका था पर उनकी पहली हिन्दी कहानी सरस्वती पत्रिका के दिसम्बर अंक में १९१५ में सौत नाम से प्रकाशित हुई और १९३६ में अंतिम कहानी कफन नाम से प्रकाशित हुई। 



उपन्यास: सेवासदन, प्रेमाश्रम, निर्मला, रंगभूमि, गबन, गोदान ; 

कहानी संग्रह: नमक का दरोग़ा, प्रेम पचीसी, सोज़े वतन, प्रेम तीर्थ, पाँच फूल, सप्त सुमन ; 

बालसाहित्य: कुत्ते की कहानी, जंगल की कहानियाँ आदि।

कृतियाँ

प्रेमचन्द की रचना-दृष्टि विभिन्न साहित्य रूपों में प्रवृत्त हुई। बहुमुखी प्रतिभा संपन्न प्रेमचंद ने उपन्यास, कहानी, नाटक, समीक्षा, लेख, सम्पादकीय, संस्मरण आदि अनेक विधाओं में साहित्य की सृष्टि की। प्रमुखतया उनकी ख्याति कथाकार के तौर पर हुई और अपने जीवन काल में ही वे ‘उपन्यास सम्राट’ की उपाधि से सम्मानित हुए। उन्होंने कुल १५ उपन्यास, ३०० से कुछ अधिक कहानियाँ, ३ नाटक, १० अनुवाद, ७ बाल-पुस्तकें तथा हजारों पृष्ठों के लेख, सम्पादकीय, भाषण, भूमिका, पत्र आदि की रचना की लेकिन जो यश और प्रतिष्ठा उन्हें उपन्यास और कहानियों से प्राप्त हुई, वह अन्य विधाओं से प्राप्त न हो सकी। यह स्थिति हिन्दी और उर्दू भाषा दोनों में समान रूप से दिखायी देती है।

उपन्‍यास

प्रेमचंद के उपन्‍यास न केवल हिन्‍दी उपन्‍यास साहित्‍य में बल्कि संपूर्ण भारतीय साहित्‍य में मील के पत्‍थर हैं। प्रेमचन्द कथा-साहित्य में उनके उपन्यासकार का आरम्भ पहले होता है। उनका पहला उर्दू उपन्यास (अपूर्ण) ‘असरारे मआबिद उर्फ़ देवस्थान रहस्य’ उर्दू साप्ताहिक ‘'आवाज-ए-खल्क़'’ में ८ अक्टूबर, १९०३ से १ फरवरी, १९०५ तक धारावाहिक रूप में प्रकाशित हुआ। उनका दूसरा उपन्‍यास 'हमखुर्मा व हमसवाब' जिसका हिंदी रूपांतरण 'प्रेमा' नाम से 1907 में प्रकाशित हुआ। चूंकि प्रेमचंद मूल रूप से उर्दू के लेखक थे और उर्दू से हिंदी में आए थे, इसलिए उनके सभी आरंभिक उपन्‍यास मूल रूप से उर्दू में लिखे गए और बाद में उनका हिन्‍दी तर्जुमा किया गया। उन्‍होंने 'सेवासदन' (1918) उपन्‍यास से हिंदी उपन्‍यास की दुनिया में प्रवेश किया। यह मूल रूप से उन्‍होंने 'बाजारे-हुस्‍न' नाम से पहले उर्दू में लिखा लेकिन इसका हिंदी रूप 'सेवासदन' पहले प्रकाशित कराया। 'सेवासदन' एक नारी के वेश्‍या बनने की कहानी है। डॉ रामविलास शर्मा के अनुसार 'सेवासदन' में व्‍यक्‍त मुख्‍य समस्‍या भारतीय नारी की पराधीनता है। इसके बाद किसान जीवन पर उनका पहला उपन्‍यास 'प्रेमाश्रम' (1921) आया। इसका मसौदा भी पहले उर्दू में 'गोशाए-आफियत' नाम से तैयार हुआ था लेकिन 'सेवासदन' की भांति इसे पहले हिंदी में प्रकाशित कराया। 'प्रेमाश्रम' किसान जीवन पर लिखा हिंदी का संभवतः पहला उपन्‍यास है। यह अवध के किसान आंदोलनों के दौर में लिखा गया। इसके बाद 'रंगभूमि' (1925), 'कायाकल्‍प' (1926), 'निर्मला' (1927), 'गबन' (1931), 'कर्मभूमि' (1932) से होता हुआ यह सफर 'गोदान' (1936) तक पूर्णता को प्राप्‍त हुआ। रंगभूमि में प्रेमचंद एक अंधे भिखारी सूरदास को कथा का नायक बनाकर हिंदी कथा साहित्‍य में क्रांतिकारी बदलाव का सूत्रपात कर चुके थे। गोदान का हिंदी साहित्‍य ही नहीं, विश्‍व साहित्‍य में महत्‍वपूर्ण स्‍थान है। इसमें प्रेमचंद की साहित्‍य संबंधी विचारधारा 'आदर्शोन्‍मुख यथार्थवाद' से 'आलोचनात्‍मक यथार्थवाद' तक की पूर्णता प्राप्‍त करती है। एक सामान्‍य किसान को पूरे उपन्‍यास का नायक बनाना भारतीय उपन्‍यास परंपरा की दिशा बदल देने जैसा था। सामंतवाद और पूंजीवाद के चक्र में फंसकर हुई कथानायक होरी की मृत्‍यु पाठकों के जहन को झकझोर कर रख जाती है। किसान जीवन पर अपने पिछले उपन्‍यासों 'प्रेमाश्रम' और 'कर्मभूमि' में प्रेमंचद यथार्थ की प्रस्‍तुति करते-करते उपन्‍यास के अंत तक आदर्श का दामन थाम लेते हैं। लेकिन गोदान का कारुणिक अंत इस बात का गवाह है कि तब तक प्रेमचंद का आदर्शवाद से मोहभंग हो चुका था। यह उनकी आखिरी दौर की कहानियों में भी देखा जा सकता है। 'मंगलसूत्र' प्रेमचंद का अधूरा उपन्‍यास है। प्रेमचंद के उपन्‍यासों का मूल कथ्‍य भारतीय ग्रामीण जीवन था। प्रेमचंद ने हिंदी उपन्‍यास को जो ऊँचाई प्रदान की, वह परवर्ती उपन्‍यासकारों के लिए एक चुनौती बनी रही। प्रेमचंद के उपन्‍यास भारत और दुनिया की कई भाषाओं में अनुदित हुए, खासकर उनका सर्वाधिक चर्चित उपन्‍यास गोदान।

असरारे मआबिद उर्फ़ देवस्थान रहस्य’ उर्दू साप्ताहिक ‘'आवाज-ए-खल्क़'’ में ८ अक्टूबर, १९०३ से १ फरवरी, १९०५ तक प्रकाशित। सेवासदन १९१८, प्रेमाश्रम १९२२, रंगभूमि १९२५, निर्मला १९२५, कायाकल्प १९२७, गबन १९२८, कर्मभूमि १९३२, गोदान १९३६, मंगलसूत्र (अपूर्ण), प्रतिज्ञा, प्रेमा, रंगभूमि, मनोरमा, वरदान।

कहानी

उनकी अधिकतर कहानियोँ में निम्न व मध्यम वर्ग का चित्रण है। डॉ॰ कमलकिशोर गोयनका ने प्रेमचंद की संपूर्ण हिंदी-उर्दू कहानी को प्रेमचंद कहानी रचनावली नाम से प्रकाशित कराया है। उनके अनुसार प्रेमचंद ने कुल ३०१ कहानियाँ लिखी हैं जिनमें ३ अभी अप्राप्य हैं। प्रेमचंद का पहला कहानी संग्रह सोज़े वतन नाम से जून १९०८ में प्रकाशित हुआ। इसी संग्रह की पहली कहानी दुनिया का सबसे अनमोल रतन को आम तौर पर उनकी पहली प्रकाशित कहानी माना जाता रहा है। डॉ॰ गोयनका के अनुसार कानपुर से निकलने वाली उर्दू मासिक पत्रिका ज़माना के अप्रैल अंक में प्रकाशित सांसारिक प्रेम और देश-प्रेम (इश्के दुनिया और हुब्बे वतन) वास्तव में उनकी पहली प्रकाशित कहानी है।

उनके जीवन काल में कुल नौ कहानी संग्रह प्रकाशित हुए- सोज़े वतन, 'सप्‍त सरोज', 'नवनिधि', 'प्रेमपूर्णिमा', 'प्रेम-पचीसी', 'प्रेम-प्रतिमा', 'प्रेम-द्वादशी', 'समरयात्रा', 'मानसरोवर' : भाग एक व दो और 'कफन'। उनकी मृत्‍यु के बाद उनकी कहानियाँ 'मानसरोवर' शीर्षक से 8 भागों में प्रकाशित हुई। प्रेमचंद साहित्‍य के मु्दराधिकार से मुक्‍त होते ही विभिन्न संपादकों और प्रकाशकों ने प्रेमचंद की कहानियों के संकलन तैयार कर प्रकाशित कराए। उनकी कहानियों में विषय और शिल्प की विविधता है। उन्होंने मनुष्य के सभी वर्गों से लेकर पशु-पक्षियों तक को अपनी कहानियों में मुख्य पात्र बनाया है। उनकी कहानियों में किसानों, मजदूरों, स्त्रियों, दलितों, आदि की समस्याएं गंभीरता से चित्रित हुई हैं। उन्होंने समाजसुधार, देशप्रेम, स्वाधीनता संग्राम आदि से संबंधित कहानियाँ लिखी हैं। उनकी ऐतिहासिक कहानियाँ तथा प्रेम संबंधी कहानियाँ भी काफी लोकप्रिय साबित हुईं। प्रेमचंद की प्रमुख कहानियों में ये नाम लिये जा सकते हैं-

'पंच परमेश्‍वर', 'गुल्‍ली डंडा', 'दो बैलों की कथा', 'ईदगाह', 'बड़े भाई साहब', 'पूस की रात', 'कफन', 'ठाकुर का कुआँ', 'सद्गति', 'बूढ़ी काकी', 'तावान', 'विध्‍वंस', 'दूध का दाम', 'मंत्र' आदि।

नाटक

प्रेमचंद ने संग्राम (1923), कर्बला (1924) और प्रेम की वेदी (1933) नाटकों की रचना की। ये नाटक शिल्‍प और संवेदना के स्‍तर पर अच्‍छे हैं लेकिन उनकी कहानियों और उपन्‍यासों ने इतनी ऊँचाई प्राप्‍त कर ली थी कि नाटक के क्षेत्र में प्रेमचंद को कोई खास सफलता नहीं मिली। ये नाटक वस्‍तुतः संवादात्‍मक उपन्‍यास ही बन गए हैं।

लेख/निबंध

प्रेमचंद एक संवेदनशील कथाकार ही नहीं, सजग नागरिक व संपादक भी थे। उन्‍होंने 'हंस', 'माधुरी', 'जागरण' आदि पत्र-पत्रिकाओं का संपादन करते हुए व तत्‍कालीन अन्‍य सहगामी साहित्यिक पत्रिकाओं 'चाँद', 'मर्यादा', 'स्‍वदेश' आदि में अपनी साहित्यिक व सामाजिक चिंताओं को लेखों या निबंधों के माध्‍यम से अभिव्‍यक्‍त किया। अमृतराय द्वारा संपादित 'प्रेमचंद : विविध प्रसंग' (तीन भाग) वास्‍तव में प्रेमचंद के लेखों का ही संकलन है। प्रेमचंद के लेख प्रकाशन संस्‍थान से 'कुछ विचार' शीर्षक से भी छपे हैं। प्रेमचंद के मशहूर लेखों में निम्‍न लेख शुमार होते हैं- साहित्‍य का उद्देश्‍य, पुराना जमाना नया जमाना, स्‍वराज के फायदे, कहानी कला (1,2,3), कौमी भाषा के विषय में कुछ विचार, हिंदी-उर्दू की एकता, महाजनी सभ्‍यता, उपन्‍यास, जीवन में साहित्‍य का स्‍थान आदि।

अनुवाद

प्रेमचंद एक सफल अनुवादक भी थे। उन्‍होंने दूसरी भाषाओं के जिन लेखकों को पढ़ा और जिनसे प्रभावित हुए, उनकी कृतियों का अनुवाद भी किया। 'टॉलस्‍टॉय की कहानियाँ' (1923), गाल्‍सवर्दी के तीन नाटकों का हड़ताल (1930), चाँदी की डिबिया (1931) और न्‍याय (1931) नाम से अनुवाद किया। आजाद-कथा (उर्दू से, रतननाथ सरशार), पिता के पत्र पुत्री के नाम (अंग्रेजी से, जवाहरलाल नेहरू) उनके द्वारा रतननाथ सरशार के उर्दू उपन्‍यास फसान-ए-आजाद का हिंदी अनुवाद आजाद कथा बहुत मशहूर हुआ।

पुरस्कार व सम्मान

प्रेमचंद की स्मृति में भारतीय डाकतार विभाग की ओर से ३१ जुलाई १९८० को उनकी जन्मशती के अवसर पर ३० पैसे मूल्य का एक डाक टिकट जारी किया गया।

 गोरखपुर के जिस स्कूल में वे शिक्षक थे, वहाँ प्रेमचंद साहित्य संस्थान की स्थापना की गई है

प्रेमचंद की १२५वीं सालगिरह पर सरकार की ओर से घोषणा की गई कि वाराणसी से लगे इस गाँव में प्रेमचंद के नाम पर एक स्मारक तथा शोध एवं अध्ययन संस्थान बनाया जाएगा।


तैंतीस वर्षों के रचनात्मक जीवन में वे साहित्य की ऐसी विरासत सौंप गए जो गुणों की दृष्टि से अमूल्य है और आकार की दृष्टि से असीमीत।