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"જો તમારી અંદર પ્રતિભા હોય તો તમે જરૂર સફળ થશો પછી ભલે પરિસ્થિતીઓ કેટલી પણ વિપરીત કેમ ન હોય તે તમને સફળતાની ઉડાન ભરવાથી ક્યારેય રોકી શકશે નહી"

23 May, 2021

सुमित्रानंदन पंत

  सुमित्रानंदन पंत


जन्म  20 मई 1900

जन्म-स्थान – ग्राम कौसानी, उत्तराखंड

मूलनाम – गोसाईदत्त

उपाधि –

  • प्रकृति के सुकुमार कवि
  • छायावाद का प्रतिनिधि कवि – आचार्य शुक्ल
  • छायावाद का प्रवर्तक – नंददुलारे वाजपेयी
  • छायावाद का विष्णु – कृष्णदेव झारी
  • संवेदनशील इंद्रिय बोध का कवि
मृत्यु-स्थान – 28 दिसम्बर 1977 (इलाहाबाद में)


जन्म-स्थानः-

छायावादी वृहत्रयी के कौशेय कवि, सौन्दर्यावतार कवि श्री समित्रानन्दन पन्त जी का जन्म मई 20, 1900 ई० (संवत् 1957 वि०) को प्रकृति की सुरम्य क्रीड़ा स्थली कूर्मांचल प्रदेश के अन्तर्गत अल्मोड़ा जिले के कौसानी नामक गाँव में हुआ था।

पिताः-

पन्त जी के पिता का नाम पं गंगादत्त पन्त था। पिता पं. गंगादत्त पन्त कौसानी में चाय-बागान के मैनेजर और एकाउण्टैण्ट थे। वे लकड़ी और कपड़े का व्यापार भी करते थे।

माताः-

प्रकृति के सुसुमार कवि पं. श्री समित्रानन्दन पन्त जी की माता का नाम श्रीमती सरस्वती देवी था।

सुमित्रानन्दन पन्त जी के बाल्यकाल का नामः-

पन्त जी के बचपन का मूल नाम गोसाईदत्त पन्त था। बाद में उन्होंने अपना नाम गोसाईदत्त से बदलकर सुमित्रानन्दन पन्त रखा।

शिक्षाः-

सन् 1905 में पाँच वर्ष के बालक पन्त ने विद्यारम्भ किया। पिता जी ने लकड़ी की पट्टी पर श्रीगणेशाय नमः लिखकर सरस्वती के वरद पुत्र को स्वर-व्यंजन वर्ण लिखना सिखाया। पन्त जी का प्रथम विद्यालय होने का श्रेय प्राप्त हुआ- उनके गाँव कौसानी की पाठशाला कौसानी वनार्क्यूलर स्कूल को। पन्त के फूफाजी ने उन्हें संस्कृत की शिक्षा दी तथा 1909 तक मेघदूत, अमरकोश, रामरक्षा-स्रोत, चाणक्य नीति, अभिज्ञान-शाकुन्तलम् आदि का ज्ञान पन्त जी को करवा दिया ।

पन्तजी के पिताजी ने उन्हें स्वयं घर पर ही अंग्रेजी की शिक्षा प्रदान दी। इसके पश्चात् ये अल्मोड़ा के गवर्नमेण्ट हाईस्कूल में प्रविष्ट हुए। तत्पश्चात् काशी के जयनारायण हाईस्कूल, बनारस से हाईस्कूल की परीक्षा द्वितीय श्रेणी में उत्तीर्ण की। हाईस्कूल के बाद पन्त जी ने आगे की शिक्षा हेतु प्रयाग के म्योर कॉलेज में प्रवेश प्राप्त किया। तीर्थराज प्रयाग पन्त जी की साहित्य-साधना का केन्द्र बना।

बाद में कालेज और परीक्षा के कठोर नियंत्रण से मुक्त होकर पन्त जी स्वाध्याय में निरत हुए और स्वयं ही अपने आप को शिक्षित करना प्रारम्भ किया। पन्त जी का लगाव संगीत से भी था। उन्होंने सारंगी, हारमोनियम, इसराज तथा तबला पर संगीत का अभ्यास भी किया और सुरुचिपूर्ण रहन-सहन तथा आकर्षक वेशभूषा से उधर झुकते भी गये।

श्री सुमित्रानन्दन पन्त जी द्वारा किये गये महत्वपूर्ण कार्यः-

सन् 1921 ई० में महात्मा गाँधी के आह्वान पर कॉलेज छोड़ दिया। सन् 1921 में गाँधी और गाँधी-विचार-दर्शन ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि वे पढ़ाई छोड़कर असहयोग आन्दोलन में सम्मिलित हो गये। किन्तु अपने कोमल स्वभाव के कारण सत्याग्रह में सम्मिलित न रह सके और पुनः साहित्य-साधना में संलग्न हो गये।
सन् 1950 में पन्त जी आकाशवाणी से जुड़े और वहाँ चीफ प्रोड्यूसर के पद पर सन् 1957 तक कार्यरत् रहे। सन् 1958 में आकाशवाणी में ही हिन्दी परामर्शदाता के रूप में रहे। तथा सोवियत-भारत-मैत्री-संघ के निमन्त्रण पर पन्त जी ने सन् 1961 में रूस तथा अन्य यूरोपीय देशों की यात्रा की।

पं. श्री सुमित्रानन्दन पन्त जी को प्रकृति का सुकुमार कवि क्यों कहा जाता हैः-

प्रकृति आदर्श शिक्षिका-संरक्षिका होती है। प्रकृति की गोद में माँ की ममता और पिता का प्रेम एक साथ प्राप्त होता है।

कवि ने स्वयं लिखा है— “ मेरी प्रारम्भिक रचनाएँ प्रकृति की ही लीला – भूमि में लिखी गयी है। ” श्री सुमित्रानन्दन पन्त जी के काव्य में कल्पना एवं भावों की सुकुमार कोमलता के दर्शन होते हैं। इन्होंने प्रकृति एवं मानवीय भावों के चित्रण में विकृत तथा कठोर भावों को स्थान नहीं दिया है। इनकी छायावादी कविताएँ अत्यन्त कोमल एवं मृदुल भावों को अभिव्यक्ति करती हैं। इन्हीं कारणों से पन्त जी को प्रकृति का सुकुमार कवि कहा जाता है।

श्री सुमित्रानन्दन पन्त जी को प्राप्त मान-सम्मान व पुरस्कारः-

  1. सन् 1960 ई० में हिन्दी-साहित्यकारों ने अज्ञेय द्वारा सम्पादित मानग्रन्थ- रूपाम्बरा, राष्ट्रपित-भवन में तत्कलीन राष्ट्रपति डॉ० राजेन्द्र प्रसाद ने पन्त जी को दिया था। पन्त जी की षष्टि पूर्ति पर दिया गया रूपाम्बरा जैसा मानग्रन्थ अभी तक शायद ही किसी अन्य को प्राप्त हुआ हो।
  2. भारत सरकार द्वारा उनकी साहित्यिक-कलात्मक उपलब्धियों हेतु पदम-भूषण सम्मान सन् 1961 में प्रदान किया गया।
  3. कला और बूढ़ा चाँद पर सन् 1961 में ही साहित्यिक अकादमी का पाँच हजार रुपये का अकादमी पुरस्कार मिला।
  4. लोकायतन महाकाव्य पर नवम्बर, 1965 में प्रथम सोवियत लैण्ड नेहरू पुरस्कार प्राप्त हुआ।
  5. सन् 1965 में ही उत्तर प्रदेश सरकार का विशिष्ट साहित्यिक सेवा हेतु दस हजार रुपये का पुरस्कार मिला।
  6. पन्त जी को सन् 1967 ई० में विक्रम विश्वविद्यालय द्वारा डी० लिट० की मानद उपाधि से विभूषित किया।
  7. पन्त जी को सन् 1968 में चिदम्बरा पर भारतीय ज्ञान-पीठ का एक लाख रुपये का पुरस्कार प्राप्त हुआ था।

मृत्यु-स्थानः-

पन्त जी आजीवन सृजन-कर्म में निरत-निलीन रहे। सरस्वती के इस पुजारी, ने इलाहाबाद की भूमि पर 77 वर्ष की आयु में, 28 दिसम्बर, 1977 ई० को अपने मधुरिम गान को भू पर छोड़कर स्वर्णिम पखेरु उड़ गये।


साहित्यिक-परिचयः-

पन्त जी का बाल्यकाल कौसानी के सुरम्य वातावरण में व्यतीत हुआ। इस कारण प्रकृति ही उनकी जीवन-सहचरी के रूप में रही और काव्य-साधना भी प्रकृति के बीच रहकर ही की। अतः प्रकृति वर्णन, सौन्दर्य प्रेम और सुकुमार कल्पनाएँ उनके काव्य में प्रमुख रूप से पायी जाती हैं। प्रकृति-वर्णन की दृष्टि से पन्त जी हिन्दी के वर्ड्सवर्थ माने जाते हैं। छायावादी युग के ख्याति प्राप्त कवि सुमित्रानन्दन पन्त सात वर्ष की अल्पायु से कविताओं की रचना करने लगे थे।

उनकी प्रथम रचना सन् 1916 ई० में सामने आयी। गिरजे का घण्टा नामक इस रचना के पश्चात् वे निरन्तर काव्य साधना में तल्लीन रहे। पन्त जी के साहित्य पर कवीन्द्र रवीन्द्र, स्वामी विवेकानन्द का और अरविन्द दर्शन का भी पर्याप्त प्रभाव पड़ा है। इसलिए उनकी बाद की रचनाओं में अध्यात्मवाद और मानवतावाद के दर्शन होते है। उनकी कल्पना ऊँची, भावना कोमल और अभिव्यक्ति प्रभावपूर्ण है। अन्त में पन्त जी प्रगतिवादी काव्यधारा की ओर उन्मुख होकर दलितों और शोषितों की लोक क्रांति के अग्रदूत बने। पन्तजी ने साम्यवाद के समान ही गाँधीवाद का भी स्पष्ट रूप से समर्थन करते हुए लिखा है—

मनुष्यत्व का तत्व सिखाता निश्चित हमको गाँधीवाद,
सामूहिक जीवन विकास की साम्य योजना है अविवाद।

कृतियाँ:-

पन्त जी बहुमुखी प्रतिभा-सम्पन्न साहित्यकार थे। अपने विस्तृत साहित्यिक जीवन में उन्होंने विविध विधाओं में साहित्य रचना की। उनकी प्रमुख कृतियों का विवरण इस प्रकार है—

लोकायतन (महाकाव्य)- पन्त जी का लोकायतन महाकाव्य लोक जीवन का महाकाव्य है। यह महाकाव्य सन् 1964 में प्रकाशित हुआ। इस महाकाव्य में कवि की सांस्कृतिक और दार्शनिक विचारधारा व्यक्त हुई है। इस रचना में कवि ने ग्राम्य-जीवन और जन-भावना को छन्दोबद्ध किया है।

वीणाः- इस रचना में पन्त जी के प्रारम्भिक प्रकृति के अलौकिक सौन्दर्य से पूर्ण गीत संगृहीत हैं।

पल्लवः- इस संग्रह में प्रेम, प्रकृति और सौन्दर्य के व्यापक चित्र प्रस्तुत किये गये हैं।

ग्रन्थिः- इस काव्य-संग्रह में वियोग का स्वर प्रमुख रूप से मुखरित हुआ है। प्रकृति यहाँ भी कवि की सहचरी रही है।

गुंजनः- इसमें प्रकृति प्रेम और सौन्दर्य से सम्बन्धित गम्भीर एवं प्रौढ़ रचनाएं संकलित की गई हैं।

अन्य कृतियाँ :- स्वर्णधूलि, स्वर्ण-किरण, युगपथ, उत्तरा तथा अतिमा आदि में पन्तजी महर्षि अरविन्द के नवचेतनावाद से प्रभावित है। युगान्तयुगवाणी और ग्राम्या में कवि समाजवाद और भौतिक दर्शन की ओर उन्मुख हुआ है। इन रचनाओँ में कवि ने दीन-हीन और शोषित वर्ग को अपने काव्य का आधार बनाया है।

 

  • नन्ददुलारे वाजपेयी पन्त को छायावाद का प्रवर्तक मानते है  ।
  • शुक्ल के अनुसार “छायावाद के प्रतिनिधि कवि”।
  • प्रथम रचना – गिरजे का घण्टा(1916)
  • अंतिम रचना -लोकायतन (1964)
  • प्रथम छायावादी रचना – उच्छवास
  • अंतिम छायावादी रचना -गुंजन
  • छायावाद का अंत और प्रगतिवाद के उदय वाली रचना – युगांत
  • गांधी और मार्क्स से प्रभावित रचना – युगवाणी
  • सौन्दर्य बोध की रचना – उतरा
  • पन्त एव बच्चन द्वारा मिलकर लिखी रचना – खादी के फूल
  • छायावाद का मेनिफेस्टो/घोषणापत्र – पल्लव
  • प्रकृति की चित्रशाला- पल्लव
  • चिदम्बरा काव्य पर -ज्ञानपीठ पुरस्कार 1968(हिंदी साहित्य का प्रथम ज्ञानपीठ पुरस्कार मिला)
  • कला और बूढ़ा चाँद –साहित्य अकादमी पुरस्कार (1960)
  • लोकायतन रचना पर – सोवियत लैंड पुरस्कार।

स्मृति विशेष

उत्तराखण्ड में कुमायूँ की पहाड़ियों पर बसे कौसानी गांव में, जहाँ उनका बचपन बीता था, वहां का उनका घर आज 'सुमित्रा नंदन पंत साहित्यिक वीथिका' नामक संग्रहालय बन चुका है। इस में उनके कपड़े, चश्मा, कलम आदि व्यक्तिगत वस्तुएं सुरक्षित रखी गई हैं। संग्रहालय में उनको मिले ज्ञानपीठ पुरस्कार का प्रशस्तिपत्र, हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा मिला साहित्य वाचस्पति का प्रशस्तिपत्र भी मौजूद है। साथ ही उनकी रचनाएं लोकायतन, आस्था आदि कविता संग्रह की पांडुलिपियां भी सुरक्षित रखी हैं। कालाकांकर के कुंवर सुरेश सिंह और हरिवंश राय बच्चन से किये गये उनके पत्र व्यवहार की प्रतिलिपियां भी यहां मौजूद हैं।

संग्रहालय में उनकी स्मृति में प्रत्येक वर्ष पंत व्याख्यान माला का आयोजन होता है। यहाँ से 'सुमित्रानंदन पंत व्यक्तित्व और कृतित्व' नामक पुस्तक भी प्रकाशित की गई है। उनके नाम पर इलाहाबाद शहर में स्थित हाथी पार्क का नाम 'सुमित्रानंदन पंत बाल उद्यान' कर दिया गया है।




सन २०१५ में पन्त जी की याद में एक डाक-टिकट जारी किया गया था।

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